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नज़्म
दिमाग़ अपना क़दम रखते ही पहूँचा अर्श-ए-आ'ला पर
ज़मीन-ए-कू-ए-जानाँ आसमाँ मालूम होती है
नजमा तसद्दुक़
नज़्म
जो नफ़स है हदफ़-ए-दशना-ए-क़ातिल है अभी
दिल के हर ज़ख़्म से रिसता है उमीदों का लहू
क़ैसर-उल जाफ़री
नज़्म
यही दस बीस अगर हैं कुश्तागान-ए-ख़ंजर-अंदाज़ी
तो मुझ को सुस्ती-ए-बाज़ू-ए-क़ातिल की शिकायत है
शिबली नोमानी
नज़्म
आख़िर इक कू-ए-मलामत में क़दम आ पहुँचे
नावक अंदाज़ों के अंदाज़ में ग़म आ पहुँचे
मुसव्विर सब्ज़वारी
नज़्म
हमारे शेरों में मक़्तल के इस्तिआरे हैं
हमारे ग़ज़लों ने देखा है कूचा-ए-क़ातिल