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नज़्म
ता-बदख़्शाँ फिर वही ला'ल-ए-गिराँ पैदा करे
सू-ए-गर्दूं नाला-ए-शब-गीर का भेजे सफ़ीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
उठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अब संग-ओ-ख़िश्त ओ ख़ाक ओ ख़ज़फ़ सर-बुलंद हैं
ताज-ए-वतन का लाल-ए-दरख़्शाँ चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नुत्क़ हो जाता है इल्मी इस्तलाहों से उदास
लाल-ए-लब में शहद की बाक़ी नहीं रहती मिठास
जोश मलीहाबादी
नज़्म
वो ख़ाक हो कि जिस में मिलें रेज़ा-हा-ए-ज़र
वो संग बन कि जिस से निकलते हैं लाल-ए-नाब
सय्यद वहीदुद्दीन सलीम
नज़्म
पढ़ना लिखना तो छोड़ो यहाँ खाने के लाले हैं
ऐसे न घबराओ के इन नन्हे हाथों पर छाले हैं
अंकिता गर्ग
नज़्म
राह में महके गुलाब और राह में लाले खिले
दीद की लेकिन उन्हें रफ़्तार फ़ुर्सत भी तो दे