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नज़्म
अल्फ़ाज़ की इफ़रात होती है
मगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मो'तबर लगती हैं बातें
गुलज़ार
नज़्म
नज़र आता है यूँ लगता है जैसे ये बला-ए-जाँ
मिरा हम-ज़ाद है हर गाम पर हर मोड़ पर जौलाँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तो ऐसे लगता था जैसे दिल में उतर रही हो
कुछ इस तयक़्क़ुन से बात करती थी जैसे दुनिया
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
क़मर अपने लिबास-ए-नौ में बेगाना सा लगता था
न था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन-ए-मुसल्लम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
काँपता फिरता है क्या रंग-ए-शफ़क़ कोहसार पर
ख़ुश-नुमा लगता है ये ग़ाज़ा तिरे रुख़्सार पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगाव
हर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँ