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नज़्म
इसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुला
इसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
फ़िक्र से झुक जाए वो गर्दन तुफ़ ऐ लैल ओ नहार
जिस में होना चाहिए फूलों का इक हल्का सा हार
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ज़िंदगी है तो कोई बात नहीं है ऐ दोस्त
ज़िंदगी है तो बदल जाएँगे ये लैल ओ नहार
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
बंद है कमरे के अंदर गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार
क्या ख़बर आई ख़िज़ाँ कब कब गई फ़स्ल-ए-बहार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ग़म हरे करती है फ़स्ल-ए-अश्क-बार-ए-बर्शगाल
मिस्ल-ए-क़िस्मत तार हैं लैल-ओ-नहार-ए-बर्शगाल
ज़े ख़े शीन
नज़्म
तू बदल डाले निज़ाम-ए-हिंद के लैल-ओ-नहार
ये ग़ुलाम आबाद हो आज़ाद मुल्कों में शुमार