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नज़्म
मुंतज़िर जिन का नहीं कोई भी दशरथ अफ़सोस
साथ लक्ष्मण भी नहीं क़ुर्बत-ए-सीता भी नहीं
अब्दुल हामिद देहलवी
नज़्म
तअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँ
मुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँ
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जनम दिन लक्ष्मी का है भला इस दिन का क्या कहना
यही वो दिन है जिस ने राम को राजा बनाया था
नज़ीर बनारसी
नज़्म
ऐसी ख़ामोशी से उक्ता के नहाने वाला
कुछ इस अंदाज़ से इक तान लगाता है कि लुक़्मान ही याद आता है
मीराजी
नज़्म
ऊटी शिमला दार्जिलिंग से शहर बसाने वाले हो
तात्या-टोपे लक्ष्मी-बाई टीपू की औलाद हो तुम
अर्श मलसियानी
नज़्म
लक्ष्मी की मोहब्बत ने दिल मोह लिया इतना
मुँह मोड़ के का'बे से पहुँचे सू-ए-बुत-ख़ाना
ज़रीफ़ लखनवी
नज़्म
कर रहे हैं लक्ष्मी-पूजन भी घरों में साहूकार
देव दौलत को समझ बैठे हैं रब्ब-ए-इक़्तिदार
शातिर हकीमी
नज़्म
वो लक्ष्मी-पूजन वो अक़ीदत के बुलावे
तुम आ के रहो घर में कि रौनक़ है तुम्हीं से