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नज़्म
वो मलका जो ब-रंग-ए-अज़्मत-ए-शाहाना रहती थी
यही वादी है वो हमदम जहाँ रेहाना रहती थी
अख़्तर शीरानी
नज़्म
करता हूँ मैं शिकायत ये तुझ से दोस्ताना
रखता न था जहाँ में मैं शौकत-ए-शहाना
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
लिबास-ए-फ़ाख़िरा पर सीमिययाई तीर चलता है
जमाल-ए-शहर के ए'ज़ाज़-ए-यकताई का तमग़ा टूट जाता है
जावेद हुमायूँ
नज़्म
ज़ेब देता है लिबास-ए-नौ नए अंदाज़ में
तन बदन भी है मोअ'त्तर ये जमाल-ए-ईद है