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नज़्म
मगर इक बात पूछूँ तुम ख़फ़ा तो हो न जाओगे
ये आख़िर क्या सबब है आज कल नज़्में नहीं लिखते
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
आदिल मंसूरी
नज़्म
बहुत से लोग कैफ़े आ के पढ़ते लिखते रहते हैं
मोहम्मद अल्वी की नज़्में तो मैं भी साथ लाया हूँ
स्वप्निल तिवारी
नज़्म
मुझे मा'लूम है लेकिन ये सब तुम कह नहीं सकते
उसी लम्हे तुम्हें याद आने लगते हैं