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नज़्म
वो इल्म में अफ़लातून सुने वो शेर में तुलसीदास हुए
वो तीस बरस के होते हैं वो बी-ए एम-ए पास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत में
ग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ुदी को गर मिटाएगा ख़ुदा भी मिल ही जाएगा
उठाया चाहिए दिल से हिजाब-ए-मा-ओ-तू पहले
नारायण दास पूरी
नज़्म
इक जहाँ जिस में न हो कुछ मा-ओ-तू का इम्तियाज़
इक जहाँ आज़ाद-ए-क़ैद-ए-ईन-ओ-आँ मेरे लिए