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नज़्म
सुख़न माल-ए-मोहब्बत की दुकान-आराई करता है
सुख़न सौ तरह से इक रम्ज़ की रुस्वाई करता है
जौन एलिया
नज़्म
चादरें माल-ए-ग़नीमत में जो अब के आईं
सेहन-ए-मस्जिद में वो तक़्सीम हुईं सब के हुज़ूर
शिबली नोमानी
नज़्म
सुब्ह-दम जब मिरे दरवाज़े से गुज़री है सबा
अपने चेहरे पे मले ख़ून-ए-सहर गुज़री है
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
माल-ए-दीन ओ माल-ए-दुनिया का बड़ा डीलर बनूँ
मुल्क के अंदर बनूँ या मुल्क के बाहर बनूँ
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मेरी नज़रों में है मेरठ और देहली का ज़वाल
जानता हूँ मैं जो था झांसी की रानी का मआल