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नज़्म
अज़-माह-ताब-ए-माही बंदे हैं बे-ज़र उस के
कल वक़्त-ए-शाम सूरज मलने को मुँह पर उस के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो तुम चाहो तो इस की धूम इक आलम में मच जाए
यही हैं वो कि जो रूठे हुओं को हैं मना सकते
निसार कुबरा अज़ीमाबादी
नज़्म
सरसब्ज़ हो गया है वीरान सारा जंगल
जंगल में मच गया है हर-सू ख़ुशी का मंगल
मोहम्मद शरफ़ुद्दीन साहिल
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मता-ए-दिल मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ
बहुत कुछ बह गया है सैल-ए-माह-ओ-साल में अब तक
जौन एलिया
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
वो मेरे आसमाँ पर अख़्तर-ए-सुब्ह-ए-क़यामत है
सुरय्या-बख़्त है ज़ोहरा-जबीं है माह-ए-तलअत है