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नज़्म
झूम उठते हैं फ़रिश्ते तक तिरे नग़्मात पर
हाँ ये सच है ज़मज़मे तेरे मचाते हैं वो धूम
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जब क्लास से टीचर जाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
हम मिल कर शोर मचाते हैं तो कितनी मसर्रत होती है
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
तो मुझ को हम-नशीं अपना लड़कपन याद आता है
कभी ख़ाली क्लासों में जो बच्चे ग़ुल मचाते हैं
शमीम करहानी
नज़्म
कव्वे मैना कोयल चिड़ियाँ मिल कर शोर मचाते
माँ के हाथों की इक ख़ुशबू बस्ती थी रोटी में
काैसर जहाँ काैसर
नज़्म
धीरे धीरे मेंडक अपना साज़ बजाते निकले
भीगी भीगी शांत फ़ज़ा में शोर मचाते निकले