aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "machine"
महीन लफ़्ज़ों में इक जगह यूँ लिखा है इस ने:''तुम्हें भी तो याद होगी वो रात सर्दियों कीजब औंधी कश्ती के नीचे हम नेबदन के चूल्हे जला के तापे थे, दिन किया थाये पत्थरों का बिछौना हरगिज़ न सख़्त लगता जो तुम भी होतींतुम्हें बिछाता भी ओढ़ता भी''
घास भी मुझ जैसी हैपाँव-तले बिछ कर ही ज़िंदगी की मुराद पाती हैमगर ये भीग कर किस बात गवाही बनती हैशर्मसारी की आँच कीकि जज़्बे की हिद्दत कीघास भी मुझ जैसी हैज़रा सर उठाने के क़ाबिल होतो काटने वाली मशीनउसे मख़मल बनाने का सौदा लिएहमवार करती रहती हैऔरत को भी हमवार करने के लिएतुम कैसे कैसे जतन करते होन ज़मीं की नुमू की ख़्वाहिश मरती हैन औरत कीमेरी मानो तो वही पगडंडी बनाने का ख़याल दुरुस्त थाजो हौसलों की शिकस्तों की आँच न सह सकेंवो पैवंद-ए-ज़मीं हो करयूँही ज़ोर-आवरों के लिए रास्ता बनाते हैंमगर वो पर-ए-काह हैंघास नहींघास तो मुझ जैसी है!
देख आए हम भी दो दिन रह के देहली की बहारहुक्म-ए-हाकिम से हुआ था इजतिमा-ए-इंतिशारआदमी और जानवर और घर मुज़य्यन और मशीनफूल और सब्ज़ा चमक और रौशनी रेल और तारकेरोसिन और बर्क़ और पेट्रोलियम और तारपीनमोटर और एरोप्लेन और जमघटे और इक़्तिदारमशरिक़ी पतलूँ में थी ख़िदमत-गुज़ारी की उमंगमग़रिबी शक्लों से शान-ए-ख़ुद-पसंदी आश्कारशौकत-ओ-इक़बाल के मरकज़ हुज़ूर-ए-इमपररज़ीनत-ओ-दौलत की देवी इम्प्रेस आली-तबारबहर-ए-हस्ती ले रहा था बे-दरेग़ अंगड़ाइयाँथेम्स की अमवाज जमुना से हुई थीं हम-कनारइंक़िलाब-ए-दहर के रंगीन नक़्शे पेश थेथी पए-अहल-ए-बसीरत बाग़-ए-इबरत में बहारज़र्रे वीरानों से उठते थे तमाशा देखनेचश्म-ए-हैरत बन गई थी गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहारजामे से बाहर निगाह-ए-नाज़-ए-फ़त्ताहान-ए-हिन्दहद्द-ए-क़ानूनी के अंदर ऑनरेबलों की क़तारख़र्च का टोटल दिलों में चुटकियाँ लेता हुआफ़िक्र-ए-ज़ाती में ख़याल-ए-क़ौम ग़ाएब फ़िल-मज़ारदावतें इनआ'म स्पीचें क़वाइ'द फ़ौज कैम्पइज़्ज़तें ख़ुशियाँ उम्मीदें एहतियातें ए'तिबारपेश-रौ शाही थी फिर हिज़-हाईनेस फिर अहल-ए-जाहबअ'द इस के शैख़ साहब उन के पीछे ख़ाकसार
एक था मुल्ला-नसरुद्दीनकरता था बातें नमकीनकाम था उस का अहमक़ बननासीधी बात को उल्टा करनाखाने पीने का शौक़ीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीनउस से हैं मंसूब लतीफ़ेमज़े मज़े के ढेरों क़िस्सेख़ुशियों की था एक मशीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीनएक गधा था उस के पासएक गधी थी जिस की सासऔर बच्चे थे उस के तीनएक था मुल्ला-नसरुद्दीन
ज़मीन-ए-वियतनाममैं भी इक सर-ज़मीं का बासी हूँजो अभी तक मिरी हैकल का पता नहीं है कि मेरे पाँव मिरी ज़मीन पर फिसल रहे हैंकोई बड़े ज़ोर-दार हाथों सेदूर बैठाज़मीन का पल्लू पकड़ के अपनी तरफ़ उसे खींचता ही जाता हैमैं खिंचा जा रहा हू पल्लू समेतठहरूँ तो मेरे पाँव फिसल रहे हैंमैं दूसरी सम्त मुँह अगर कर के भाग निकलूँज़मीन खिंच जाए पाँव से तो ख़ला में गिरने का डर है मुझ कोज़मीन-ए-वियतनामइस से पहले कि मेरे पैरों तले से मेरी ज़मीन खिंच जाएआज तुझ से मुक़ाबला अपना कर रहा हूँकि मुझ में तुझ में जो मुश्तरक क़दर है वो जंगी सऊबतें हैंमिरा भी दुश्मन वही है जो तुझ से लड़ रहा हैतिरी ज़मीन पर भी जंग जारीमिरी ज़मीं पर भी जंग जारीअगर कोई फ़र्क़ है तो ये है कि अपने दुश्मन के सामने तू बहादुरी से डटा हुआ हैमैं झुक गया हूँयहाँ ज़रा मुख़्तलिफ़ है सूरतकि मेरा दुश्मन डटा हुआ हैमैं सर भी अपना झुका चुका हूँमैं उस की मिन्नत भी कर चुका हूँमगर वो बे-रहम मारे ही जा रहा हैकिसी तरह मानता नहीं हैबस अपनी मनवाए जा रहा हैज़मीन-ए-वियतनामतू ने इतने बरस गँवाएकरोड़ों अफ़राद अपने मरवाएतू ने मिन्नत ही की न सौदा किया न फ़ौजों का सर झुकायाअजब कि तू ने रगों में ख़ून की बजाए बारूद भर लिया हैतू बावली हैये देख बारह करोड़ के चंद मालिकों का भी कार-नामाउन्हें भी इक जंग आ पड़ी थीउन्हों ने सोला दिनों में वो कर दिया जो सदियों में भी न होताझुका दिए अपने लाख फ़ौजीमिटा दिए अपने लाख फ़ौजीमिटा दिए अपने निस्फ़ झगड़ेकटा दिया अपना निस्फ़ नक़्शाजो निस्फ़ बाक़ी था और सोला दिनों का झगड़ा था गर ये रहताक्यूँ न होताकि हर बड़ी क़ौम काम ऐसे किया ही करती है जो कि तारीख़ के लिए बाब खोलते हैंये कार-नामाये सिर्फ़ तारीख़ का नहीं हैये कार-नामा तो है जुग़राफ़िया भी जिस ने बदल दिया हैबहुत बड़ी क़ौम का ये कर्तब हैक़ौम सुई बनाना अपने लिए जो तू जानती नहीं हैये क़ौम बारूद जिस की ख़ातिर बड़े ममालिक बना रहे हैंबहुत बड़ी क़ौम है बहुत हीजहाज़ के कार-ख़ाने बैरून-ए-मुल्क जिस के बने हुए हैंवो जिस की ख़ातिर कि ब्यूक इम्पाला फ़ोर्ड ऑर्डर पे बन रही हैमशीन इंजन मिलों का सामान कार-ख़ाने के सारे औज़ाररेडियो टेलीफ़ोन टेलीविज़न ट्रैक्टर मशीन-गन तोपग़रज़ एक एक शय उस की उस के कमी ख़ुद अपने मुल्कों में उस की ख़ातिर बना रहे हैंबहुत बड़ी क़ौम है कि उस के बड़े घरों में तो सर का शेव भीतन के कपड़े भी और जूते भी उस के बाहर से आ रहे हैंज़मीन-ए-वियतनामतेरी माएँ तो अपने बच्चे के क़द को देखती हैं कि उस की लम्बाई कार से तो बड़ी नहीं हैज़मीन-ए-वियतनामबेटियाँ तेरी अपने शानों पे अपने शेरों का बोझ ले कर पाँव की सूरत हैं ईस्तादामगर यहाँ बेटियाँ नहीं हैंयहाँ तो तोहफ़े हैंजो कि बाहर से आए सौदागरों की ख़ातिर तवाज़ो' करने के वास्ते कर रहे हैंज़मीन-ए-वियतनामतेरे बेटे तो तेरे वारिस तिरे मुहाफ़िज़ हैंफ़ौज वो बन रहे हैं तेरी कि तुझ पे जानें निसार कर देंज़मीन-ए-वियतनामतेरे बेटे तो तेरे वारिस तिरे मुहाफ़िज़ हैंफ़ौज वो बन रहे हैं तेरी कि तुझ पे जानें निसार कर देंयहाँ पे बेटी नहीं तो बेटे भी इस ज़मीं ने नहीं जने हैंयहाँ तो तनख़्वाह की ज़रूरत है फ़ौज में हो कि मौज में होज़मीन-ए-वियतनामतेरा आदम कहाँ से आया थाबेटियाँ तेरी कौन सी बे-मिसाल हव्वा की बेटियाँ हैंज़मीन-ए-वियतनाम तेरी मिट्टी कहाँ की है जो कितेरे दुश्मन ने चाँद तस्ख़ीर कर लिया पर न तुझ को जीतातिरा ख़ुदा कौन सा ख़ुदा हैमिरे ख़ुदा का सलाम उस कोमगर मिरे वियतनाम जो फ़र्क़ तुझ में मुझ में है और थोड़ा सा दूर कर दूँतिरी लड़ाई तो सिर्फ़ दुश्मन से है कि जो तेरे सामने हैमिरी लड़ाई है दुश्मनों से जो सामने हो के भी मिरे सामने नहीं हैंमैं दुश्मनों से भी लड़ रहा हूँमें दोस्तों से भी लड़ रहा हूँ जो दोस्ती का लिबास पहनेमिरी लड़ाई अड़ोसियों से पड़ोसियों सेमिरी लड़ाई है अपने घर मेंमिरी लड़ाई समुंदरों के उधर भी क़ाएममिरी लड़ाई है जिस्म से भीमिरी लड़ाई है ज़ेहन से भीमिरी लड़ाई तो सामराजी निज़ाम से हैजहाँ जहाँ सामराज है मैं वहाँ वहाँ पर डटा हुआ हूँमैं अपनी ग़ुर्बत से अपनी मज़लूमियत से आगाह हो चुका हूँमिरी ये ग़ुर्बत ये मेरी मज़लूमियत ही क़ुव्वत हैवो सिपाही नहीं है मेरा जो अपने हेल्मट के बोझ से सर झुका चुका हैजो सिर्फ़ तनख़्वाह के लिए मेरा शेर जरनैल बन गया हैमेरा ये क़ल्लाश मेरा बे-कार मेरा मज़दूर वो सिपाही हैजो मिरी फ़ौज बन रहा हैज़मीन के पल्लू को अपनी इस ताज़ा फ़ौज की बे-पनाह क़ुव्वत से थाम करअब मैं अपनी जानिब घसीट लूँगाघसीट लूँगा मैं उन को भी वो जो दूसरी सम्त अपने आहन के हाथ ले करमिरी ज़मीन अपनी सम्त लालच से खींचते हैंज़मीन-ए-वियत्नाम गर तिरी सर-ज़मीं पे बारूद की तहें बिछ गई हैं तो उस ज़मींके खेतों में भी फ़क़त गोलियाँ उगेंगीयहाँ भी पेड़ों को अब फलों की बजाए बम ही लगेंगेइस सर-ज़मीं पे भी आग ही के दरिया बहेंगेजिन मैं कि कोई काग़ज़ की नाव वो सामराज की हो कि मेरी अपनीन चल सकेगीज़मीन-ए-वियतनाम मैं भी इक सर-ज़मीं का बासी हूँइस ज़मीं का सलाम तुझ को
मशीन चल रही हैंनीले पीले लाल लोहे की मशीनों मेंहज़ारों आहनी पुर्ज़ेमुक़र्रर हरकतों के दाएरों मेंचलते फिरते हैंसहर से शाम तक पुर-शोर आवाज़ें उगलते हैं
''मैं अपनी दुनिया-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न तज के आज बन-बास में पड़ा हूँज़रूरतों में घिरा हुआ हूँयहाँ तो दो और दो का हासिल हमेशा ही चार हाथ आयाकि पाँच ना-मुम्किनात में हैअज़ीम फ़नकार का क़लम हो कि कार-ख़ानेकिसी को तख़्लीक़-ए-हुस्न की आरज़ू नहीं हैमुक़द्दस आग उन के दिल की यूँ पेट के जहन्नम में जल रही हैकि ज़िंदगी की जो क़ुव्वतें हैं वो ख़ुद को ज़िंदा ही रखने में सर्फ़ हो रही हैंमशीन की तरह ज़ेहन भी काम कर रहे हैंरगों में जीते लहू के बदले रक़ीक़ लोहा भरा हुआ हैमशीन की तरह पाँव चलते हैंआदमी का जलाल गर्दिश में सर-निगूँ हैइरादा व इख़्तियार इक इज़्तिराब-ए-संगीं है जिस से बच करकोई नहीं दो घड़ी किसी से जो बे-ग़रज़ रुक के बात कर ले(किसे ख़बर, आदमी के दो मीठे बोल को मैं तरस गया हूँ)''
ख़ुदा-ए-बर्तरतेरी वहदानियत की क़समजब भी तेरे आगे सर-ब-सुजूद हुईतो निय्यत कीकि ज़मीन के उन तमाम ख़ुदाओं को रद्द करती हूँजो अपने ओहदों के आगेमुझे झुकाने पर ब-ज़िद रहेऐ हमेशा रहने वाली ज़ातजब कोई जिस्म-ए-ख़ाकी ताक़त के नशे मेंकिसी कमज़ोर को कुचलता हैतब गुज़रता वक़्त इस पर बहुत हँसता हैऐ राज़िक़-ए-रहीमहम ऐसे निज़ाम को भोग रहे हैंजहाँ एक की बक़ा दूसरे की भूक पर क़ाबिज़ होने में हैतू कि वाक़िफ़ है दिलों के भेद सेऐसे हालात आ जाते हैं किसच गोशा-नशीन हो जाता हैशराफ़त और हया पेसंग-बारी होती हैऐ ख़ालिक़-ए-काएनाततू ने अपने कलाम में ज़मीन का दुख बयान किया हैजो अन-गिनत मज़ालिम अपने ऊपर झेलती हैइस ज़मीन की ख़ामोशी की क़समसारे ज़ालिम अपनी दश्त अपनी सफ़्फ़ाकियों का खेल रचाते रचातेएक दिन ज़मीन के अंदर चले जाते हैंऐ ख़ुदा-ए-अज़ीमये ज़मीन मेरा बिछौनामैं ने उस की ख़ामुशी को अपने सीने में उतारातेरे अता किए हुए हौसले नेमेरे क़दम उखड़ने नहीं दिएवर्नाकिसी ड्रिल-मशीन की तरहजुमले दिल में सूराख़ करते गएतशन्नुज-ज़दा चेहरों पर हँसी तब दिखाई दीजब आँखों से ख़्वाब छीन लिए गएऐ मेरे पर्वरदिगारहमें एक ऐसा मुआ'शरा दिया गयाजहाँ हमारे फेपड़ों पे पाँव रख के हुक्मरानी करने वालेहमारी साँस के चलने रुकने का तमाशा देखते हैंतमाशा-बीनों की आँखों उस अंत की मुंतज़िर होती हैंकि जब इन से ज़िंदा रहने की भीक माँगी जाएऐ मेरे माबूदमैं ने ऐसे ही कगार पेतेरी बरतरी तलब कीऐ मेरे दुखों के राज़-दाँतू वाक़िफ़ हैजब मेरे इर्द-गिर्द गिर्या-ए-वहशत तारी थाऔर मुझे बताया जा रहा थाकि सरतान मेरे बाप को खा रहा हैवो वक़्त था कि न कोई हर्फ़-ए-तसल्ली काम आ सकता था न कोई उम्मीद बाक़ी रह गई थीमेरी आँखें ख़ुश्क थींमेरे सारे आँसू मेरे अंदर गिरते गएवो वक़्त था मेरे माबूदजब तू ने मेरे क़ल्ब को ग़म से लबरेज़ कर केमेरी तर्बियत की थीमुझे बावर हुआकि आने वाले वक़्त में क़दम क़दम पेमुझे सरतान का सामान करना होगाफ़िक़्रों में क़हक़हों मेंउस शैतान को कंकरी कौन मारेजो तारीक दिलों के मिना में बैठा हैमेरे मौलामैं किसी मो'जिज़े की मुंतज़िर नहींबस इतनी हिम्मत दे मुझेकि तीरगी के मुक़ाबिलरौशनी को हमेश्गी दे दूँ
कन्वेंस कुछ भी जब नज़र आया न दाएँ बाएँसोचा कि आज हम भी मिनी-बस में बैठ जाएँजाना था लालू-खेत चढ़े थे सद्र से हमरुख़्सत हुए थे सर-ब-कफ़न अपने घर से हमहर राह बस की शहर-ए-ख़मोशाँ की राह थीहर सीट बस की आख़िरी आराम-गाह थीरक़्क़ास-ए-ख़ुश-अदा की तरह हिल रही थी बसना-आश्ना ट्रक से गले मिल रही थी बसफ़ुट-पाथ से भी हाथ मिलाती हुई चलीठुमका क़दम क़दम पे लगाती हुई चलीपुर्ज़ा हर एक मज़हर-ए-चंग-ओ-रुबाब थाइस बस का इत्तिफ़ाक़ से भोंपू ख़राब थाढीली कमानियों में तरन्नुम बला का थादेखा उतर के बस से तो झोंका हवा का थागाने में ठीक-ठाक थे चलने में वीक थेइस महफ़िल-ए-समाअ में पहिए शरीक थेनाज़ुक समाअतों पे सितम ढा रही थी बसउल्टे सुरों में कोई ग़ज़ल गा रही थी बसहो तो गए थे बस में मुसाफ़िर सब एडजस्टडर था कि हो न जाए कहीं टायरों में बर्स्टबस में सिकुड़ के थान से चिट हो गए थे हमपुर्ज़े थे और मशीन में फ़िट हो गए थे हमजो कुछ भी मिल रहा था लिए जा रहे थे हमधक्कों की गेंद कैच किए जा रहे थे हममजबूर हो गए थे जमील ओ हसीन लोगमुर्ग़ा बने हुए थे मुअज़्ज़िज़-तरीन लोगबस में मिसाल-ए-शाख़-ए-समर झुक गए थे लोगख़ुद्दार ओ सर-बुलंद थे पर झुक गए थे लोगकुछ शौक़िया थे कुछ ब-इरादा झुके हुएअज़्मत-मियाँ थे सब से ज़्यादा झुके हुएआज़ाद तब्अ वाक़िफ़-ए-गैराज ही न थीसिगनल की बत्तियों की तो मुहताज ही न थीस्टाप से चली तो रुकी इक दुकान मेंआख़िर उसे पनाह मिली साएबान मेंवो लोग चल दिए जो सर-ए-रहगुज़र न थे''मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक-ए-सफ़र न थे''
क्या जाने उस ज़रीफ़ के क्या दिल में आई थीकर्फ़्यू में जिस ने महफ़िल-ए-शेरी सजाई थीअल्लाह ऐसा ज़ौक़ जहन्नम में डाल देकर्फ़्यू में शाइरों को जो घर से निकाल देऐसे में जब कि शहर के सब रास्ते हों बंदसड़कों पे आ गए थे ये बा-ज़ौक़ शर-पसंदऐसे में जब कि घर से निकलना मुहाल थालेकिन ये शाइरों की अना का सवाल थाशेअरी-महाज़ ख़ाना-ए-शाएर से दूर थाकाबा में हाजियों को पहुँचना ज़रूर थाशाइर रवाँ थे शेर के चाक़ू लिए हुएदिल में ख़याल-ए-ख़िदमत-ए-उर्दू लिए हुएज़ोर-ए-क़लम के साथ सिपाह-ए-रियाज़ थीक़ानून हाथ में था बग़ल में बयाज़ थीगलियों में क़त्ल-ओ-ख़ूँ था सड़क पर फ़साद थाशाइर ब-ज़ोर-ए-फ़िक्र शरीक-ए-जिहाद थाकैसी निकल रही थी सदा गन-मशीन सेजैसे किसी को दाद मिले सामईन सेशाइर बयाज़ लाए थे संदूक़ की तरहमिसरे उगल रहे थे वो बंदूक़ की तरहजब फ़ाइरिंग अहल-ए-सुख़न की हुई तमामये ख़िदमत-ए-अदब का पुलिस ने सिला दियाकुछ शाइरों को रोड पे मुर्ग़ा बना दियाकुछ कोहना-मश्क़ भी थे सुजूद-ओ-रुकू मेंजबरन उन्हें पढ़ाया गया था शुरूअ' मेंतरही मुशाएरे का समाँ दे रहे थे वोइक मिस्रा-ए-तरह पे अज़ाँ दे रहे थे वोकुछ शाइरों को नग़्मा-सराई की फ़िक्र थीसद्र-ए-मुशाइरा को रिहाई की फ़िक्र थीजब शाइरों के हाथ शरीक-ए-दुआ हुएकर्फ़्यू का वक़्त ख़त्म हुआ तब रिहा हुएसब अपने अपने घर गए इस हाव-हू के बअ'दशाइर-अज़ीम होता है हर कर्फ़्यू के बअ'द
महीना भर सर के बाल न कटवाऊँ तो मुझे क्यादेखने वालों को वहशत होने लगती हैहर हफ़्ते हाथों और पैरों के नाख़ुन न लूँ तोमहसूस होता है जानवर बनता जा रहा हूँसुब्ह शेव न बनाऊँ तो घर से निकलते झिजक आती हैठहरिए ज़रा मैं देख लूँ बाहर ये शोर कैसा हैअरे माली लॉन में घास की मशीन फेर रहा थाआप तो जानते हैं घास न कटे तो मच्छर जान नहीं छोड़तेवैसे कभी आप ने ताकिस्तानों में अंगूर की टुड-मुंड मुढियों को देखा हैयक़ीन ही नहीं आता कि उन से नई शाख़ें फूटेंगीजो पत्तों और गुच्छों से लद जाएँगीअभी मैं ने गुलाब के पौदों की अपने हाथों से काँट-छाँट की हैमेरी आलिम फ़ाज़िल बीवी की जान निकलती जा रही थीजब मैं बेदर्दी से क़ैंची चला रहा थालेकिन मैं बाग़बानों की औलाद हूँदुख तो मुझे भी होता हैपले हुए पौदों और दरख़्तों को छांगते हुएलेकिन फूल और फल तो उस के बग़ैर यूँ समझे रंग ही नहीं लातेन वो हुस्न न वो मज़ा न वो बोहतातआप भी सोचते होंगे पंजाब का मुक़द्दमा लड़ते लड़तेमैं हज्जामों और मालियों की वकालत करने तो नहीं चल पड़ासादा सी बात है कि इंसानों और पौदों की तराश-ख़राश होती रहनी चाहिएलेकिन क्या बाल कटवा लिए जाएँ नाख़ुन ले लिए जाएँ शेव कर ली जाएतो काम ख़त्म हो जाता हैक्या इंसान सिर्फ़ जिस्म का नाम है याजज़्बात ख़यालात ख़्वाहिशात और अज़ाएम भी हमारा हिस्सा हैंतो क्या जिस्म के साथ उन की तराश-ख़राश भी ज़रूरी हैशायद जज़्बात और ख़यालात की तराश-ख़राश ही को तहज़ीब कहते हैंशायद ख़्वाहिशातन और अज़ाएम की नोक-पलक सँवारने ही से तमद्दुन ने जन्म लिया हैवर्ना तो इंसान ग़रज़-मंदाना हुक़ूक़ ही के चक्कर से नहीं निकलताऔर ज़िमादारियोंं के इदराक-ओ-एहसास की नौबत ही नहीं आतीमुआ'फ़ कीजिए ये सारी चोरी-चकारी बद-कारी हवस-कारीये सारी लूट-मार जाल-साज़ी हराम-ज़दगी बे-सब्री ना-शुक्र-गुज़ारीये सारा झूट फ़रेब लालच फ़ित्ना फ़सादजज़बात-ओ-ख़यालात और ख़्वाहिशात-ओ-अज़ाइम की हजामत न बनाने ही का तो नतीजा हैजनाब जज़्बात को तमीज़ और ख़यालात को अख़्लाक़ न सिखाया जाएख़्वाहिशात और अज़ाएम के मुँह पर इंसानियत की लगाम न दी जाएतो फिर वही कुछ होता है जो आज हमारे यहाँ हो रहा हैऔर ये कह कर ज़ियादा दिन गुज़ारा नहीं हो सकता किइस तरह तो होता है इस तरह के कामों मेंआप हँसेंगे मैं जब भी ये मिस्रा पढ़ता हूँइस तरह से मुझे उस्तुरा याद आ जाता हैक़ैंचियाँ याद आ जाती हैं हजामत याद आ जाती हैकुछ भी हो मैं तो समझता हूँ कि क़ौमी सत्ह पर हमारी हजामत बहुत ज़रूरी हो गई हैहमारे सिर्फ़ बाल और नाख़ुन ही नहीं बढ़ गएहम ज़ाहिर ही में नहीं बातिन में भी जानवर बनते जा रहे हैंजानवरियत हमारे दिल-ओ-दिमाग़ में उतर गई हैअब तो अंदर बाहर हजामत की ज़रूरत हैभई बुलाओ किसी नश्तर-ब-दसत हज्जाम को जो हजामत बनाए और फ़स्द खोले हमारीलेकिन एक अनार और सौ बीमारएक अकेला हज्जाम और चौदह करोड़ इंसानये तो हम सब को ख़ुद ही आईने के सामने बैठ कर हजामत बनाई और फ़स्द खोलनी पड़ेगी अपनीतो भाइयो और बहनोमेरे प्यारे हम-वतनोआज से क़ौमी सत्ह पर हमारा यक-निकाती एजंडा क्या ठहराबोलिए सब बोलिए पूरे ज़ोर से बोलिएहजामतहजामतअपनी अपनी हजामत
मैं एक आज़ाद वतन की शहरी हूँअपने शहर गाँव गलियों खेत खलियानों केसभी रस्तों को जानतीबिन-देखे सब दरख़्तों कोउन की ख़ुशबू से पहचान सकती हूँइस मिट्टी की क़ब्रों मेंमेरे आबा का लम्स शामिल हैमैं इस की महक अपनी रूह में महसूस करती हूँमेरे आँगन में उतरते सब परिंदेउसी हवा में साँस लेते हैं जिस में मैं जीती हूँमैं अपने परिंदों इस मिट्टी और हवा को छोड़ करकैसे कहीं और ज़िंदगी जी सकती हूँमैं खौफ़ज़दा तो नहींमगर अब अक्सर कुछ गुज़रगाहों से गुज़रते हुएअचानक मुझे रोक कर मशीनी आले से चेक किया जाता हैमशीन मेरे बदन में कुछ तलाश करती हैमेरे लिबादे और हैंड-बैग को खंगाला जाता हैमेरे हैंड-बैग में डॉक्टर के चंद नुस्ख़ोंएक क़लम गुलाबी रंग की लिपस्टिक और एक क़दीम सेमोबाइल फ़ोन के सिवाकुछ नहीं निकलताचंद खूँ-ख़्वार कुत्ते मुझे और मेरी सवारी को सूँघते हैंतब मैं अपने आप से भी नज़रें चुरा लेती हूँइस तकलीफ़-दह अमल से जब कुछ हासिल नहीं होतातो मुझे आगे जाने की इजाज़त मिल ही जाती हैमैं खौफ़ज़दा तो नहींमगर सोचती हूँअपने ही वतन में मेरी शनाख़्तइतनी मश्कूक क्यों हो गई है
रक्खा क़दम क्लर्क ने जिस दम ज़मीन परदेखा हर एक चीज़ है क़ुदरत के दीन परबोला कि मैं तो ज़िंदा रहूँगा रूटीन परमुझ पर मशीन होगी मैं हूँगा मशीन परइस आहनी सनम की इबादत है मुझ पे फ़र्ज़नौकर हूँ बादशाह का जीता हूँ ले के क़र्ज़
जश्न-ए-जम्हूरियत अब मनाएँदीप यूँ हम ख़ुशी के जलाएँआई छब्बीस फिर जनवरीहौसलों में हुई ताज़गीरफ़्ता रफ़्ता हम आगे बढ़ेंफिर तरक़्क़ी का सामान करेंकार-ख़ाने मशीन अस्लहाहर मशीन हम बनाएँ ज़राकाम से हम को रग़बत भी होदेश की यूँ हिफ़ाज़त भी होसारे धर्मों का सम्मान होभारती जो हो यक जान होनग़्मे जम्हूर के गुनगुनाएँहम सदा यूँ ही ख़ुशियाँ मनाएँ
मैं चाहता हूँकि मेरा बेटाजवान हो करकिसी हसीना की काकुलों का असीर ठहरेमिरी दुआ हैकि ये रिवायत न टूट जाएउसे भी कुछ दिल की रहनुमाई मेंज़िंदगी को गुज़ारने का शरफ़ अता होमशीन उस को भी बन ही जाना है आख़िरशबस दुआ यही हैकि मंतिक़ों और मस्लहत कीनपी-तुली ज़िंदगी से पहलेवो जी के देखे ख़ुद अपनी ख़ातिरकिसी की ख़ातिरवो अपना आपा भुला के देखेजो उस को मोहतात बन ही जाना हैअपनी नींदों के ज़िम्न में भीतो चाहता हूँवो चंद रातें तो ठंडी आहों के साथ काटेऔर इस से पहलेकि चाँद सूरज फ़क़त ज़रूरत की चीज़ ठहरेंवो नंगे पैरों सुलगती छत परखड़ा रहे इक झलक की ख़ातिरवो चाँदनी शब में मुंतज़िर हो किसी परी काख़ुराक की अहमियत का क़ाएल तो हो रहेगामैं चाहता हूँवो भूक के ज़ाइक़े से भीआश्ना अगर होतो क्या बुरा है
सुब्ह से शाम तकलकड़ियाँ चीरनाउस का बरसों का मा'मूल हैउस का जिस्मलकड़ी के बुरादे मेंदफ़्न होने लगा हैउसे रोटी भीबुरादे की बनी हुई लगती हैउस के हाथ बीवी कोसूखे दरख़्त की तरह महसूस करते हैंलकड़ियों के दरमियान रहते रहतेवोख़ुद को भीलकड़ी का आदमी समझने लगा हैवक़्त गुज़रने के साथ साथउस का ये ख़याल मज़बूत होता जाता हैऔर एक दिनआरा मशीन भीइस से मुत्तफ़िक़ हो जाती है
इस बात से भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ताकि मरने वाला ज़िंदगी से नबर्द-आज़मा किसी शाएरा या शाएर का बेटा थाया राज-पूत नस्ल का कोई ज़िंदा-दिल माज़ूल शहज़ादाया मरने वाले जवान बेटे का नाम कबीर, तारिक़ अहद या कुछ और थाजवान बेटे की मौतइंसान को पानी में हलाक करने पर मामूर फ़रिश्ते ने लीया ख़ुश्की पर इंसानी रूह क़ब्ज़ करने के मजाज़ फ़रिश्ते नेऐसी या ऐसी किसी भी बात सेकोई फ़र्क़ नहीं पड़ताक्यूँकि मौत का फ़रिश्ता तीनों मक़ामात परजवान बेटे को माँ बाप से जुदा करने में नाकाम रहामौत का फ़रिश्ता लगा रहता है दिन रातअपनी नाकामी का इंतिक़ाम लेने मेंटुकड़े टुकड़े करता रहता हैमाँ बाप का दिलजैसे काटा जाता है मशीन के तेज़ धार बलेड सेमवेशियों का चाराकोड़े मारता रहता है माँ बाप की ज़ख़्मी रूह को बरहना कर केईजाद करता रहता है नित-नए तरीक़ेमाँ बाप के बचे-खुचे दिल को अज़िय्यत पहुँचाने केमौत का फ़रिश्ता दाख़िल हो जाता है बग़ैर इजाज़तकिसी शाएर के बेड-रूम में रात ख़राब करनेमजबूर कर देता है शाएर कोज़ख़्मों से कराहती नज़्म लिखने पर
मैं अपने घर के ख़मोश दर पेखड़ी हुई हूँमैं एक कमरे सेदूसरे कोलरज़ते क़दमों से बढ़ रही हूँमैं छत के ज़ीने पे चढ़ रही हूँतुम्हारी आवाज़ आ रही हैगली गली केतमाम चेहरेमशीन दफ़्तर लिबास सारेदुकाँ मकाँ और मकीन सारेबसों के उठते धुएँ में तहलील हो रहे हैंतुम्हारी आवाज़ आ रही हैहवा की साँसें बिखर रही हैंमैं नीम-शब के अथाह कुएँ मेंसिमट रही हूँसुलगती आँखों को साथ ले करमैं नीम-ख़्वाबी में चल रही हूँतुम्हारी आवाज़ आ रही हैज़मीं का सीना बिलक रहा हैहज़ार सदियों का इक सफ़र हैउबलते आँसू मचलते सागरपिघलते लावे को पी रही हूँतुम्हारी आवाज़ आ रही हैमैं ज़र्द पौदे को ज़िंदा पानी पिला रही हूँमैं जलते ज़ख़्मों पे ठंडा मरहम लगा रही हूँतमाम अश्कों के वास्ते मैंये नर्म आँचल बिछा रही हूँतुम्हारी आवाज़ आ रही हैतमाम आलम किरन किरन हैअजीब ख़ुशबूतमाम आलम तमाम साँसोंपे छा रही हैमहक की आँखें दमक उठी हैंगुलाब से लौह भर रही हैतुम्हारी आवाज़ आ रही है
औरदूर ख़लाओं में उपर को तैरती हुईमशीन की आवाज़मद्धम होती चली गई
मैं अपनी औलाद के लिएदूध की एक बोतलअपने साहब के लिए तस्कीनघर के लिए मशीनऔर अपने लिएएक आहट बन के रह गई हूँमेरा घरजहाँ मुझे रात और दिनइंतिज़ार के दहकते हुए लम्सलपेट कर सोना पड़ रहा हैख़याल की अध-सिली बास सेकलाइयों के गजरे गूँध करसिंघार करना पड़ रहा हैतन्हाइयों के सवालहोंट की सुर्ख़ियों कीतहों में दबा करअलविदाई बोसों काजवाब सहना पड़ रहा हैख़मोश टटोलती हुईपुतलियाँ काजलों की लकीरों की जगहसजा कर आँसुओं के दरमियानहँसना पड़ रहा हैमेरा घर जहाँ मुझे अश्या-ए-सर्फ़ की तरहरहना पड़ रहा है
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