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नज़्म
सगान-ए-ख़ूक ज़ाद-ए-बर्ज़न ओ बाज़ार-ए-बे-मग़्ज़ी
मिरी जानिब अब अपने थोबड़े शाहाना करते हैं
जौन एलिया
नज़्म
चमक तारे से माँगी चाँद से दाग़-ए-जिगर माँगा
उड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़-ए-बरहम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती में
रुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की
ये धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का झक्कड़ हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर