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नज़्म
अपने गुलहा-ए-अक़ीदत पेश करती हूँ तुझे
मुख़्तसर ये है मोहब्बत पेश करती हूँ तुझे
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
तिरे लुत्फ़-ओ-अता की धूम सही महफ़िल महफ़िल
इक शख़्स था इंशा नाम-ए-मोहब्बत में कामिल
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
पर तुझे इश्क़-ओ-मोहब्बत से कहाँ फ़ुर्सत है
मय-ए-गुल-रंग की ला'नत से कहाँ फ़ुर्सत है
इफ़्फ़त ज़ेबा काकोरवी
नज़्म
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
उस के माथे से चुरा लेती है सोने की डलक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
लब पर है तल्ख़ी-ए-मय-ए-अय्याम वर्ना 'फ़ैज़'
हम तल्ख़ी-ए-कलाम पे माइल ज़रा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
देखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद
'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़'
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुकूत-ए-ज़िंदगानी जज़्ब हो जाए तरन्नुम में
रगों में ख़ून के बदले मय-ए-दो-आतिशा भर दे
मैकश हैदराबादी
नज़्म
मय-कदा था तेरा यकसर सोज़ मुतलक़ साज़ भी
थी मय-ए-हिन्दी भी साग़र में मय-ए-शीराज़ भी
मोहम्मद सादिक़ ज़िया
नज़्म
बाहें फैलाए हुए रास्ता रोके है खड़ा
कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द अफ़गन-ए-इश्क़