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नज़्म
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
सब के लिए ना-पसंदीदा उड़ती मक्खी
कितनी आज़ादी से मेरे मुँह और मेरे हाथों पर बैठती है
किश्वर नाहीद
नज़्म
मची है हर तरफ़ क्या क्या सलोनों की बहार अब तो
हर इक गुल-रू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दरवाज़े पर कुत्ता कहता भूके हैं दो दिन के
कोई दवा भी दे दो देखो मक्खी ज़ख़्म पे भिनके
असना बद्र
नज़्म
इमरान शमशाद नरमी
नज़्म
हर जागह ज़र्द लिबासों से हुई ज़ीनत सब आग़ोशों की
सौ ऐश-ओ-तरब की धुएँ में और महफ़िल में मय-नोशों की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
छोटी छोटी चीज़ें जैसे शहद की मक्खी की भिन भिन
चिड़ियों की चूँ चूँ कव्वों का एक इक तिनका चुनना
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बन-मानुस की नाक पे मक्खी बैठी लेकिन फिसल गई
भालू को आता देखा तो शहद की मक्खी सँभल गई
जमील उस्मान
नज़्म
टीचरज़ डे में अब के वो बन गईं प्रिंसिपल
क्या यादगार दिन था कैसी मची थी हलचल