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नज़्म
कहीं जम्हूरियत के अध-मूए ज़ख़्मी कराहे जा रहे हैं
खिलाड़ी ताज़ियत के रंग को चेहरे पे मलते हैं
तसनीम आबिदी
नज़्म
क्यूँ मैं अचानक सोते सोते आँखें मलते उठ जाता हूँ
और मुझे फिर नींद नहीं आती है
मुसहफ़ इक़बाल तौसिफ़ी
नज़्म
भूले-बिसरे चेहरे आँखें मलते उठते हैं
और मैं ठंडे दरवाज़े से लग कर सो जाता हूँ