aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mana.a-e-gustaaKHii"
अबतरी ला-इंतिहामाद्दा-ए-ला-इंतिहा
वो मा'नी-ए-गुरेज़-पाबस एक जस्त में
कि जिस के म'अनी-ए-दूरजानता हूँ मैं अब
मोहब्बत मा'नी-ए-हुस्न-ए-सुख़न हैमोहब्बत अल्लह वालों का चलन है
मकाँ के म'अनी-ओ-मफ़्हूमसच्चाई मुझ से फूटी है
सग-ए-हम-सफ़र और मैंमाँदा ओ गुरसना
एक धोका..... सराब..... मंबा-ए-नूर.....!रस-भरे होंट देख कर 'तासीर'
लोगों ने मेरे मादा-ए-तौलीद सेदीवारों पर फूल बना लिए
एक दिन मंसूख़ होना हैउसे वो मअनी-ओ-मफ़्हूम खोना है
अज़ल से ऐसे हीबग़ैर मा'नी-ओ-मक़्सद बला का शोर लिए
नज़र से महव है उम्मुल-किताब की तफ़्सीरहुज़ूर मअ'नी-ए-ग़ैब-ओ-ज़हूर खो बैठे
मनार-ए-मस्जिद-ए-जामे से दे रहा हूँ सदादकन की ख़ाक के ज़र्रो तुम्हें हज़ार सलाम
तेरा सुकून तेरा क़रार भी तारीक हैतारीकी ही अस्ल मंबा-ए-नूर है
जैसे म'अनी-ओ-मफ़्हूम का इक नया सिलसिलाऔर फिर यूँ हुआ
मंबा-ए-नूर थे लब-ओ-रुख़्सारचाँद सूरज का बाब था वो शख़्स
सुकूँ के होंटों पे लफ़्ज़ों के साज़ हँसते हैंजहाँ मआ'नी-ओ-असरार जगमगाते हैं
और हमें मिल गयाजैसे मा'नी-ओ-मफ़्हूम का इक नया सिलसिला
चंद दहके हुए अंगारों की सौग़ात लिएकिसी मक़्सूम किसी मा'नी-ए-मौहूम का रिश्ता ढूँडें
बादल अदबार के हैं उन के सरों पर छाएमरना आए न उन्हें और न जीना आए
हर लफ़्ज़ के मआ'नी-ओ-मतलब बदल चुकेहर बात और बात हुई जा रही है आज
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