aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mandir"
क़ुरआन न हो जिस में वो मंदिर नहीं तेरागीता न हो जिस में वो हरम तेरा नहीं है
ओ देस से आने वाले बताक्या अब भी महकते मंदिर सेनाक़ूस की आवाज़ आती हैक्या अब भी मुक़द्दस मस्जिद परमस्ताना अज़ाँ थर्राती हैऔर शाम के रंगीं सायों परअज़्मत की झलक छा जाती हैओ देस से आने वाले बता
ख़ुलूस के ऐसे दिए जलाएँबुझा सके न जिन को मुख़ालिफ़ हवाएँसदा गूँजे मंदिर की घंटियाँबराबर अज़ानें भी आएँसारी नफ़रतें बह जाएँगंगा घाट पर अगर मन भी नहलाएँनफ़रत कुदूरत से दिल साफ़ हो तोहाथों के साथ दिल भी मिलाएँगवाह बना के गंगा की लहरों कोसच्ची चाहत का वा'दा करेंऔर फिर वो वा'दे निभाएँजुस्तुजू है अब मोहब्बत की उल्फ़त की सब कोदिल की बातें सब को बताएँ
इक नन्ही मुन्नी सी पुजारनपतली बाँहें पतली गर्दनभोर भए मंदिर आई हैआई नहीं है माँ लाई हैवक़्त से पहले जाग उठी हैनींद अभी आँखों में भरी हैठोड़ी तक लट आई हुई हैयूँही सी लहराई हुई हैआँखों में तारों की चमक हैमुखड़े पे चाँदी की झलक हैकैसी सुंदर है क्या कहिएनन्ही सी इक सीता कहिएधूप चढ़े तारा चमका हैपत्थर पर इक फूल खिला हैचाँद का टुकड़ा फूल की डालीकम-सिन सीधी भोली भालीहाथ में पीतल की थाली हैकान में चाँदी की बाली हैदिल में लेकिन ध्यान नहीं हैपूजा का कुछ ज्ञान नहीं हैकैसी भोली छत देख रही हैमाँ बढ़ कर चुटकी लेती हैचुपके चुपके हँस देती हैहँसना रोना उस का मज़हबउस को पूजा से क्या मतलबख़ुद तो आई है मंदिर मेंमन उस का है गुड़िया-घर में
इस तरह है कि हर इक पेड़ कोई मंदिर हैकोई उजड़ा हुआ, बे-नूर पुराना मंदिरढूँढता है जो ख़राबी के बहाने कब सेचाक-ए-हर-बाम हर इक दर का दम-ए-आख़िर हैआसमाँ कोई पुरोहित है जो हर बाम-तलेजिस्म पर राख मले माथे पे सिन्दूर मलेसर-निगूँ बैठा है चुप-चाप न जाने कब सेइस तरह है कि पस-ए-पर्दा कोई साहिर हैजिस ने आफ़ाक़ पे फैलाया है यूँ सेहर का दामदामन-ए-वक़्त से पैवस्त है यूँ दामन-ए-शामअब कभी शाम बुझेगी न अँधेरा होगाअब कभी रात ढलेगी न सवेरा होगा
मस्जिद का गुम्बद सूना हैमंदिर की घंटी ख़ामोशजुज़दानों में लिपटे आदर्शों कोदीमक कब की चाट चुकी हैरंगगुलाबीनीलेपीलेकहीं नहीं हैंतुम उस जानिबमैं इस जानिबबीच में मीलों गहरा ग़ारलफ़्ज़ों का पुल टूट चुका हैतुम भी तन्हामैं भी तन्हा
वो तवाइफ़कई मर्दों को पहचानती हैशायद इसी लिएदुनिया को ज़ियादा जानती हैउस के कमरे मेंहर मज़हब के भगवान की एक एक तस्वीर लटकी हैये तस्वीरेंलीडरों की तक़रीरों की तरह नुमाइशी नहींउस का दरवाज़ारात गए तकहिन्दूमुस्लिमसिखईसाईहर मज़हब के आदमी के लिए खुला रहता हैख़ुदा जानेउस के कमरे की सी कुशादगीमस्जिद और मंदिर के आँगनों में कब पैदा होगी
मोरी अर्ज सुनो दस्त-गीर पीरमाई री कहूँ कासे मैंअपने जिया की पीरनय्या बाँधो रेबाँधो रे कनार-ए-दरियामोरे मंदिर अब क्यूँ नहीं आए
मैं ने सारी उम्रकिसी मंदिर में क़दम नहीं रक्खालेकिन जब सेतेरी दुआ मेंमेरा नाम शरीक हुआ हैतेरे होंटों की जुम्बिश परमेरे अंदर की दासी के उजले तन मेंघंटियाँ बजती रहती हैं!
मंदिर मस्जिद और शिवालेमानौता का भार सँभालेकितने युगों को देखे-भाले
दुनिया दिल-ए-ग़ज़ल में मय-ख़ाना इश्क़ का हैहर रूह वज्द में है हर जिस्म में नशा हैमा'शूक़ बंदगी है मा'शूक़ ही ख़ुदा हैमंदिर की घंटियों में बोले अज़ाँ का जादू
तू प्रेम मंदिर की पाक देवी तू हुस्न की मम्लिकत की रानीहयात-ए-इंसाँ की क़िस्मतों पर तिरी निगाहों की हुक्मरानीजहान-ए-उल्फ़त तिरी क़लम-रौ हरीम-ए-दिल तेरी राजधानीबहार-ए-फ़ितरत तिरे लब-ए-लाल-गूँ की दोशीज़ा मुस्कुराहटनिज़ाम-ए-कौनैन तेरी आँखों के सुर्ख़ डोरों की थरथराहटफ़रोग़-ए-सद-काएनात तेरी जबीन सीमीं की ज़ौ-फ़िशानीभड़कते सीनों में बस रही हैं क़रार बन कर तिरी अदाएँतरसती रूहों को जाम-ए-इशरत पिला रही हैं तिरी वफ़ाएँरग-ए-जहाँ में थिरक रही है शराब बन कर तिरी जवानीदिमाग़-ए-परवर-दिगार में जो अज़ल के दिन से मचल रहा थाज़बान-ए-तख़्लीक़-ए-दहर से भी न जिस का इज़हार हो सका थानुमूद तेरी उसी मुक़द्दस हसीं तख़य्युल की तर्जुमानीहै वादी-ए-नील पर तिरा अब्र-ए-ज़ुल्फ़ साया-कुनाँ अभी तकहैं जाम-ए-ईराँ की मय में तेरे लबों की शीरीनियाँ अभी तकफ़साना-गो है तिरी अभी तक हदीस-ए-यूनाँ की ख़ूँ-चकानीहै तेरी उल्फ़त के राग पर मौज-ए-रूद-ए-गंगा को वज्द अब तकतिरी मोहब्बत की आग में जल रहा है सहरा-ए-नज्द अब तकजमाल-ए-ज़ोहरा तिरे मलाएक फ़रेब जल्वों की इक निशानीतिरी निगाहों के सहर से गुल-फ़िशाँ है शेर ओ अदब की दुनियातिरे तबस्सुम के कैफ़ से है ये ग़म की दुनिया तरब की दुनियातिरे लबों की मिठास से शक्करीं है ज़हराब-ए-जिंदगानीतिरा तबस्सुम कली कली में तिरा तरन्नुम चमन चमन मेंरुमूज़-ए-हस्ती के पेच-ओ-ख़म तेरे गेसुओं की शिकन शिकन मेंकिताब-ए-तारीख़-ए-ज़िंदगी के वरक़ वरक़ पर तिरी कहानीजो तू न होती तो यूँ दरख़्शंदा शम-ए-बज़्म-ए-जहाँ न होतीवजूद-ए-अर्ज़-ओ-समा न होता नुमूदद-ए-कौन-ओ-मकाँ न होतीबशर की महदूदियत की ख़ातिर तरसती आलम की बे-करानी
मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मजबूर थे हम, मजबूर हैं हमइंसानियत के सीने में रिसता हुआ इक नासूर हैं हमदौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी सेमंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी सेहम से बाज़ार की रौनक़ है, हम से चेहरों की लाली हैजलता है हमारे दिल का दिया दुनिया की सभा उजयाली हैदौलत की सेवा करते हैं ठुकराए हुए हम दौलत केमज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम सौतेले बेटे क़िस्मत केसोने की चटाई तक भी नहीं, हम ज़ात के इतने हेटे हैंये सेजों पर सोने वाले शायद भगवान के बेटे हैंहम में नहीं कोई तब्दीली जाड़े की पाली रातों मेंबैसाख के तपते मौसम में, सावन की भरी बरसातों मेंकपड़े की ज़रूरत ही क्या है मज़दूरों को, हैवानों कोक्या बहस है, सर्दी गर्मी से लोहे के बने इंसानों कोहोने दो चराग़ाँ महलों में, क्या हम को अगर दीवाली हैमज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मज़दूर की दुनिया काली हैमज़दूर के बच्चे तकते हैं जब हसरत से दूकानों कोमज़दूर का दिल देता है दुआ देवताओं को, भगवानों कोखाया मिट्टी के बर्तन में, सोए तो बिछौने को तरसेमुख़तारों पर तन्क़ीदें हैं, बे-चारगियाँ मजबूरों कीसूखा चेहरा दहक़ानों का, ज़ख़्मी पीठें मज़दूरों कीवो भूखों के अन-दाता हैं, हक़ उन का है बे-दाद करेंहम किस दरवाज़े पर जाएँ किस से जा कर फ़रियाद करेंबाज़ार-ए-तमद्दुन भी उन का दुनिया-ए-सियासत भी उन कीमज़हब का इरादा भी उन का, दुनिया-ए-सियासत भी उन कीपाबंद हमें करने के लिए सौ राहें निकाली जाती हैंक़ानून बनाए जाते हैं, ज़ंजीरें ढाली जाती हैंफिर भी आग़ाज़ की शोख़ी में अंजाम दिखाई देता हैहम चुप हैं लेकिन फ़ितरत का इंसाफ़ दुहाई देता है
ज़िंदगी नींद में डूबे हुए मंदिर की तरहअहद-ए-रफ़्ता के हर इक बुत को लिए सूती हैघंटियाँ अब भी मगर बजती हैं सीने के क़रीबअब भी पिछले को, कई बार सहर होती है
ये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई कोइशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता हैवो देखो गाँव के सीने पे सर रक्खे हुए सरसोंतुम्हारी कम-सिनी खेली है जिस की गोद में बरसोंनुक़ूश-ए-पा से अब तक हर गली की माँग रौशन हैअभी तक गोद फैलाए हुए डेरे का आँगन हैरसीली जामुनों के पेड़ की कमज़ोर शाख़ों नेतुम्हारी उँगलियों का हर निशाँ महफ़ूज़ रक्खा हैलबों पर झील की गहराइयों के है बस इक शिकवाकि जब से तुम गए हो कोई भी हम तक नहीं पहुँचाकिनारे झील के वो पेड़ अब तक मुंतज़िर सा हैकब आओगे यहाँ कपड़े उतरोगे नहाओगेये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये इक नादान बच्चे की तरह तन्हाई कोइशारा करता है ठोड़ी पकड़ कर और कहता हैवो देखो गाँव के खलियानों में सोया हुआ जादूनशीली रात की रानी वो लौ देती हुई ख़ुश्बूदियों का धीमी धीमी रौशनी देना धुआँ देनाशिकस्ता झोंपड़ों का ज़िंदगी को लोरियाँ देनाखनकती हैं रसोई घर में अल्हड़ चूड़ियाँ अब तकभरा की पोलियाँ लाती हैं सर पर बूढ़ियाँ अब तकतलैया के किनारे कच्ची ईंटों से बना मंदिरसुलगते कंडों से उठती धुएँ की मल्गजी चादरहरे खेतों की मेंडों पर सुलगते जिस्म के साएलरज़ते होंठ घबराई हुई साँसों के अफ़्सानेलचकती आम की शाख़ों पे बल खाए हुए झूलेकिसी का भागना ये कह के कोई है हमें छू लेये देखो ज़िंदगी कितनी हसीं है कितनी भोली हैउसी आग़ोश में आ जाओ जिस में आँख खोली हैये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैये कहता है कि मैं गुज़री हुई बातों में खो जाऊँतुम्हारी ज़ुल्फ़ से महकी हुई रातों में खो जाऊँइसे मैं कैसे समझाऊँ कि अब ये साँस का डोराइक ऐसी धार की तलवार है जिस पर गुज़रना हैमुझे और ज़िंदगी के ज़ख़्म को टाँके लगाना हैंइसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरेंअब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकताअगर रक्खूँ तो नाकारा निकम्मा कह के ये दुनियामुझे ठोकर लगा दे और ख़ुद आगे को बढ़ जाएमिरी पस-मांदगी पर हर नज़र उट्ठे तरस खाएमुझे मुर्दा अजाइब-घर की ऐसी मूर्ती समझेजो सब को इस लिए प्यारी है कि काफ़ी पुरानी हैये माज़ी जो मिरी तन्हाइयों के साथ रहता हैइसे मैं कैसे समझाऊँ कि ये माज़ी की तस्वीरेंअब इक ऐसी अमानत हैं जिसे मैं रख नहीं सकता
रात गए तक घाएल नग़्मे करते हैं एलान यहाँये दुनिया है संग-दिलों की कोई नहीं इंसान यहाँइज़्ज़त वालों की ज़िल्लत का सब से बड़ा बाज़ार है येचुकते हैं ग़ैरत के सौदे बिकते हैं ईमान यहाँभीक में भी माँगो तो कोई प्यार न डाले झोली मेंबिन माँगे मिल जाते हैं रुस्वाई के सामान यहाँज़र-दारों को नग़्मों में जब जिस्म दिखाई देता हैएक महकती सेज पे अक्सर टूटती है हर तान यहाँममता के होंटों पर जब चाँदी की मोहरें लगती हैंमाँ ख़ुद अपनी बेटी को कर देती है क़ुर्बान यहाँअपना ख़ून ही बढ़ कर अपने ख़ून की बोली देता हैकिस ने किस पर हाथ बढ़ाया कोई नहीं पहचान यहाँपाप के इस मंदिर में क्या क्या भाव बताए राम-जनीशाम ढले जब आन बिराजें सोने के भगवान यहाँरात गए तक जागे साँवली काले चोरों की ख़ातिरऔर अगर इंकार करे कहलाए ना-फ़रमान यहाँझिलमिल करती पोशाकों से चाहे बदबू आती होख़ुद जल कर महफ़िल को ख़ुशबू देता है लोबान यहाँ
इन की नज़रों में इक हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे
वो ईसा चौक हो या दास मंज़िल का कोई मंदिरलोहारी गेट हो या गोठ क़ासिम की कोई बस्तीवो बाब-उल-इल्म हो या मस्जिद-ए-सिद्दीक़-ए-अकबर होहुसैनाबाद हो या वो मिरी फ़ारूक़ नगरी होजहाँ भी गोलियाँ चलती हैं मेरे दिल पे लगती हैंहर इक वो घर जहाँ मातम बपा है मेरा अपना हैये जितना ख़ून भी अब तक बहा है मेरा अपना है
है इष्ट देवताओ के मंदिर सजे हुएहैं ज़र्द ज़र्द फूलों से कुल दर सजे हुए
बस देखा और फिर भूल गएजब हुस्न निगाहों में आयामन-सागर में तूफ़ान उठातूफ़ान को चंचल देख डरी आकाश की गँगा दूध-भरीऔर चाँद छुपा तारे सोए तूफ़ान मिटा हर बात गईदिल भूल गया पहली पूजा मन मंदिर की मूरत टूटीदिन लाया बातें अनजानी फिर दिन भी नया और रात नईपीतम भी नई प्रेमी भी नया सुख सेज नई हर बात नईइक पल को आई निगाहों में झिलमिल करती पहलीसुंदरता और फिर भूल गएमत जानो हमें तुम हरजाईहरजाई क्यूँ कैसे कैसेक्या दाद जो इक लम्हे की हो वो दाद नहीं कहलाएगीजो बात हो दिल की आँखों कीतुम उस को हवस क्यूँ कहते होजितनी भी जहाँ हो जल्वागरी उस से दिल को गरमाने दोजब तक है ज़मींजब तक है ज़माँये हुस्न ओ नुमाइश जारी हैइस एक झलक को छिछलती नज़र से देख के जी भर लेने दो
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books