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नज़्म
मीराजी
नज़्म
था बुलबुले की काएनात में मिरा ही दम-क़दम
मगर मिरी उड़ान सुर्ख़ नील-गूँ सफ़ेद मक़बरे के
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
तुम्हें मा'लूम है ये सर्द आँखें तो हमारे मक़बरे हैं
हम इन क़ब्रों में 'उम्रें भोग देते हैं
मंसूर अहमद
नज़्म
यहाँ शबनम के क़तरे मक़बरे बनते हैं फूलों के
तसर्रुफ़ हैं यहाँ आईना-ख़ानों में बगूलों के