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नज़्म
सुब्ह-दम बाद-ए-सबा की शोख़ियाँ काम आ गईं
लाला-ओ-गुल को बग़ल-गीरी का मौक़ा मिल गया
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा
यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
कोई अपना हो पराया हो गले सब से मिले
मेल हो सब से यही तो मक़्सद-ए-इस्लाम है
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
मक़्सद-ए-ज़ीस्त मगर जा के कहीं डूब गया क्या लहू एक नहीं
अपने ही ख़ून की बरखा में नहाए है समाज
बेकल उत्साही
नज़्म
ये सराबों के पुजारी ये ग़ुलामों के ग़ुलाम
मज्लिस-ए-जौर-ओ-जफ़ा कारगह-ए-दाना-ओ-दाम
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
ताइर-ए-ज़ेर-ए-दाम के नाले तो सन चुके हो तुम
ये भी सुनो कि नाला-ए-ताइर-ए-बाम और है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आलम-ए-दूद-ए-सियह वो ज़ुल्फ़-ए-अम्बर-फ़ाम में
दौड़ने वाले वो शोले हल्क़ा-हा-ए-दाम में