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नज़्म
वही है शोर-ए-हाए-ओ-हू, वही हुजूम-ए-मर्द-ओ-ज़न
मगर वो हुस्न-ए-ज़िंदगी, मगर वो जन्नत-ए-वतन
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
मर्द-ओ-ज़न पीर-ओ-जवाँ इन के मज़ालिम के शिकार
ख़ून-ए-मासूम में डूबी हुई इन की तलवार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जिस के मर्द-ओ-ज़न का हिस्सा-ए-ख़ूब-रूई का जलाल
जिन के चेहरों पर छिड़कती है तवानाई गुलाल
अर्श मलसियानी
नज़्म
मर्द-ओ-ज़न कूचा-ओ-बाज़ार में रुस्वा हैं अभी
जैसे हो क़हर-ए-मुजस्सम तिरी यख़-बस्ता जबीं
असलम अंसारी
नज़्म
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
बे-तकल्लुफ़ तिफ़्ल-ए-शोख़-ओ-शैख़-ए-शैब-ओ-मर्द-ओ-ज़न
आज मशग़ूल-ए-तरब हैं लुत्फ़-ए-बाहम के लिए