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नज़्म
दास सी ताक़त दे और उस सी शहादत दे हमें
लड़ मरें बातिल से हक़ पर वो शुजाअ'त दे हमें
टीका राम सुख़न
नज़्म
जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं
कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्त
रोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँ