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नज़्म
ये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत का
सरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँ
बात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिस्म कि जिस के कच्चे ज़ख़्म बहुत दुखते थे
ज़ख़्म कि जिन का मरहम वक़्त के पास नहीं है
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
कितने ग़ुंचे हैं जिगर-चाक गुलिस्ताँ में अभी
हर तरफ़ ज़ख़्म हैं बे-मिन्नत-ए-मरहम कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
कौन मरहम ज़ख़्म-ए-जाँ पर प्यार से रख पाएगा
दर्द की शिद्दत में मेरी पीठ को सहलाएगा