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नज़्म
अगर है चूकना मंज़ूर क़ुराँ की तिलावत से
बरा-ए-ज़ख़्म-ए-ग़फ़लत मरहम-ए-ज़ंगार पैदा कर
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
कुछ ऐसा मुझ को गुमाँ था तुफ़ैल-ए-मरहम-ए-वक़्त
कोई भी घाव हो इक रोज़ भर ही जाता है
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
तजरबों ने ये सिखाया है कि हस्ती में 'अमीर'
मरहम-ए-ज़ख़्म नहीं दर्द का दरमाँ भी नहीं