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नज़्म
पलक तक उस ने मरने के लिए जीने न दी मुझ को
''मैं तेरे इश्क़ में रंजीदा हूँ हाँ अब भी कुछ कुछ हूँ
जौन एलिया
नज़्म
मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूँडूँ
और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
पुख़्ता हो जाए तू है शमशेर-ए-बे-ज़िन्हार तू
हो सदाक़त के लिए जिस दिल में मरने की तड़प
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़्लूक़
क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मरने वाली आसों का ख़ूँ-बहा नहीं मिलता
ज़िंदगी के दामन में जिस क़दर भी ख़ुशियाँ हैं