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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
हाँ देखा कल हम ने उस को देखने का जिसे अरमाँ था
वो जो अपने शहर से आगे क़र्या-ए-बाग़-ओ-बहाराँ था
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
है कुल की ख़बर उन को मगर जुज़ की ख़बर गुम
ये ख़्वाब हैं वो जिन के लिए मर्तबा-ए-दीदा-ए-तर हेच
नून मीम राशिद
नज़्म
जहान-ए-आरज़ू में अब भी हाल-ओ-क़ाल तेरा है
सुख़न की मुम्लिकत में आज तक इक़बाल तेरा है