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नज़्म
जिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सका
लेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभी
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
वो शाम कहाँ वो रात कहाँ वो वक़्त कहाँ वो बात कहाँ
जब मरते थे मरने न दिया अब जीते हैं अब जीने दो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
हशमत में जिन की अर्श से ऊँची थी बारगाह
मरते ही उन के तन हुए गलियों की ख़ाक-ए-राह
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तुम को लोगों ने बताया मर गया है एक शख़्स
और यूँ मरते हैं नादाँ हूँ कि अर्बाब-ए-उक़ूल