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नज़्म
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा कर
शबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
शो'ला-ए-जव्वाला है तू बज़्म-गाह-ए-रज़्म में
सुल्ह-ए-मा'नी-ख़ेज़ है तू रज़्म-गाह-ए-बज़्म में
साक़िब कानपुरी
नज़्म
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँ
इक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँ
ग़ुलाम भीक नैरंग
नज़्म
मंज़र-ओ-मर्सिया-ओ-रज़्म-ओ-सरापा क्या क्या
न लिखा मीर-अनीस आप ने तन्हा क्या क्या
नाज़िश प्रतापगढ़ी
नज़्म
जिस के हर असरार में पिन्हाँ है इक राज़-ए-हयात
दौर-ए-आज़ादी की जिस में हैं हज़ारों कैफ़ियात
टीका राम सुख़न
नज़्म
ऐ वफ़ा खुलते हैं तुझ पर आज क्या क्या राज़ देख
चल चमन में बुलबुल-ओ-गुल के नियाज़-ओ-नाज़ देख
मेला राम वफ़ा
नज़्म
उफ़ुक़ से शाह-ख़ावर ऐ 'रज़ी' पैग़ाम देता है
कि तेरी नज़्म सुन कर ज़लज़ला है आसमानों में
रज़ी बदायुनी
नज़्म
मयस्सर है हमें आज़ादी-ए-सैर-ए-चमन लेकिन
'रज़ी' हर वक़्त फ़िक्र-ए-आशियाँ कुछ और कहती है
रज़ी बदायुनी
नज़्म
वतन के गोशे गोशे में 'रज़ी' इक हू का 'आलम है
दिलों पर नक़्श है 'इक़बाल' ही की शान-ए-यकताई