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नज़्म
एक इक सम्त से शब-ख़ून की तय्यारी है
लुत्फ़ का वअ'दा है और मश्क़-ए-जफ़ा-कारी है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
चश्मक-ए-दम-ब-दम नहीं मश्क़-ए-ख़िराम-ओ-रम नहीं
मेरे ग़ज़ाल क्या हुए मेरे ख़ुतन को क्या हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
रात आती थी सुनाने सोज़ का पैग़ाम जब
मश्क़-ए-तहरीर-ए-जुनूँ बनता था तेरा नाम जब
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
रोज़ चौराहों पे करती है पुलिस मश्क़-ए-कलाम
जादा-पैमाओं का जारी है वही तर्ज़-ए-ख़िराम
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
बोलने के लिए ज़बान को अल्फ़ाज़ की मश्क़ करानी होती है
आज़ाद तो दिमाग़ को होना है
बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन
नज़्म
सुना है रास्ते ही में पुलिस ने धर लिया उन को
हमारे दिल पे जब करने को वो मश्क़-ए-सितम निकले