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नज़्म
की बीनाई का मसरफ़ था... वो लब दो चार दिन पहले
मिरे माथे पे हो कर सब्त जो कहते थे'' तुम जाओ
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
नज़्म
मगर मैं सोचता हूँ बात जो कहने की थी मैं ने न क्यूँ पहले ही कह दी वक़्त का
बे-फ़ाएदा मसरफ़