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नज़्म
सो इक मामूल है इमरान के घर का अजब सा कुछ
'हसन' नामी हमारे घर में इक 'सुक़रात' गुज़रा है
जौन एलिया
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
अब मैं वो जज़्बा-ए-मासूम कहाँ से लाऊँ
मेरे साए से डरो तुम मिरी क़ुर्बत से डरो
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
मा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
''हर एक करवट मैं याद करता हूँ तुम को लेकिन
ये करवटें लेते रात दिन यूँ मसल रहे हैं मिरे बदन को