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नज़्म
मताअ'-ए-दस्त-ए-सबा हो कि नक़्श-ए-फ़र्यादी
हर एक ज़ख़्म में दर्द-ए-अवाम की ख़ुशबू
मसूद मैकश मुरादाबादी
नज़्म
तुम्हारी सब मता-ए-बे-बहा
फिर से गुफाओं की अमानत हो गई है
और वो साँप उस के पहरे-दार
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
नज़्म
हाँ वो नग़्मा छेड़ जिस से मुस्कुराए ज़िंदगी
तो बजा-ए-साज़-ए-उल्फ़त और गाए ज़िंदगी
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
मता-ए-दिल मता-ए-जाँ तो फिर तुम कम ही याद आओ
बहुत कुछ बह गया है सैल-ए-माह-ओ-साल में अब तक
जौन एलिया
नज़्म
मुनव्वर सीना हो जाए फ़रोग़-ए-शम'-ए-उल्फ़त से
दिल-ए-अहल-ए-वतन को भी फ़रोज़ाँ चाहता हूँ मैं