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नज़्म
तेरे हाथों में है क़िस्मत का नविश्ता अपना
किस क़दर तुझ से भी मज़बूत है रिश्ता अपना
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
तुम्हारा मुंतज़िर है तुम मुझे मज़बूत बाँहों में
कभी हौले से ले लोगे मिरे कानों में कह दोगे
तनवीर अंजुम
नज़्म
है कोई तो बात जो वो आवाज़ दबाने पे आमादा है
लगा ले जितना दम हो अपना भी मज़बूत इरादा है
सचिन देव वर्मा
नज़्म
अज़ीज़ क़द्रों पे जाँ-कनी की गिरफ़्त मज़बूत हो गई है
पतंग की तरह कट चुके हैं तमाम रिश्ते