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नज़्म
''ज़ुल्फ़ें यूँ चेहरे पे बिखरी हुई माँगें थीं दिल
जिस तरह एक खिलौने पे मिटें दो बालक''
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
ज़ीशान साजिद
नज़्म
अपनी आँखों में जलाएँ हम मोहब्बत के चराग़
सब के ज़ेहनों से मिटें गुज़रे हुए लम्हों के दाग़