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नज़्म
तो मैं ने क्या किया
कि अपनी साँस रोक कर के, आँखें मीच कर के सर को आगे कर के
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
नज़्म
ज़फ़र सय्यद
नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
देर से बैठे हो नख़्ल-ए-रास्ती की छाँव में
क्या ख़ुदा-ना-कर्दा कुछ मोच आ गई है पाँव में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
यही सच-मुच बना देगी तिरे घर को हसीं जन्नत
ज़रा तुम प्यार से करना कभी सरशार औरत को