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नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ग़ज़लों के ऐ शहंशाह 'मीर'-ए-जहान-ए-उर्दू
बाक़ी नहीं जहाँ में नाम-ओ-निशान-ए-उर्दू
मोहम्मद ओवैस ख़ाँ
नज़्म
मज़हब-ए-इंसानियत का पासबाँ कोई न था
कारवाँ लाखों थे मीर-ए-कारवाँ कोई न था
कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
नज़्म
इसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुला
इसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
ग़ाज़ियान-ए-जंग-ए-आज़ादी का सब लिक्खा बयाँ
फिर दिया पैग़ाम उन को थे जो मीर-ए-कारवाँ
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
बुल-कलाम-'आज़ाद' से 'ग़ालिब' थे मसरूफ़-ए-सुख़न
'मीर' ओ 'मोमिन' दौर-ए-हाज़िर की ग़ज़ल पे नुक्ता-चीं
शोरिश काश्मीरी
नज़्म
तेरी कोशिश से बना हिन्दोस्ताँ जन्नत-निशाँ
रास्ता तू ने दिखाया बन के मीर-ए-कारवाँ
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
तेरी कोशिश से बना हिन्दोस्ताँ जन्नत-निशाँ
रास्ता तू ने दिखाया बन के मीर-ए-कारवाँ
तकमील रिज़वी लखनवी
नज़्म
निशान-ए-'मीर'-ओ-'ग़ालिब', 'दाग़' और 'साइल' अभी तक हैं
जो शमएँ बच गई हैं रौनक़-ए-महफ़िल अभी तक हैं