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नज़्म
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
अल्फ़ाज़ की इफ़रात होती है
मगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मो'तबर लगती हैं बातें
गुलज़ार
नज़्म
शहराम सर्मदी
नज़्म
उलूही उँगलियों का लम्स दाइम मो'तबर ठहरे
तिरे हर ख़्वाब के उस पार इक ख़्वाब-ए-दिगर ठहरे
बिलाल अहमद
नज़्म
लेकिन अगर इस के ब'अद के वसीले ज़्यादा मो'तबर ठहरें
तो हैरतें अफ़सोस और पछतावे रद्द-ए-दुआ