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नज़्म
मोटे मोटे आँसू लिए कोने में बैठी सी हूँ
बारिशों में छप छप कर मिट्टी में सने पाँव
दिव्या महेश्वरी
नज़्म
घड़ी की टिक-टिक बोल रही है रात के शायद एक बजे हैं
बटला हाउस की एक गली में मोटे कुत्ते भौंक रहे हैं
आसिम बद्र
नज़्म
वो राह चलते हुए मिली थी
वो जिस के चश्मे के मोटे शीशों पे ज़ात के दुख की गर्द की तह
नून मीम दानिश
नज़्म
बजी घंटी जो छुट्टी की तो हँसते गाते हम निकले
किसी मोटे से मौला-बख़्श के सह कर सितम निकले