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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
है शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहना
मगर मेरे ग़रीब अज्दाद ने भी कुछ किया होगा
जौन एलिया
नज़्म
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
कल वो मिली जो बचपन में मेरे भाई से खेला करती थी
जाने तब क्या बात थी उस में मुझ से बहुत ही डरती थी
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
यही सच-मुच बना देगी तिरे घर को हसीं जन्नत
ज़रा तुम प्यार से करना कभी सरशार औरत को
अरशद महमूद अरशद
नज़्म
ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ
वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ