aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mudabbir"
ऐ कि तेरा मुर्ग़-ए-जाँ तार-ए-नफ़स में है असीरऐ कि तेरी रूह का ताइर क़फ़स में है असीरइस चमन के नग़्मा-पैराओं की आज़ादी तो देखशहर जो उजड़ा हुआ था उस की आबादी तो देखफ़िक्र रहती थी मुझे जिस की वो महफ़िल है यहीसब्र-ओ-इस्तिक़्लाल की खेती का हासिल है यहीसंग-ए-तुर्बत है मिरा गिरवीदा-ए-तक़रीर देखचश्म-ए-बातिन से ज़रा इस लौह की तहरीर देखमुद्दआ तेरा अगर दुनिया में है ता'लीम-ए-दींतर्क-ए-दुनिया क़ौम को अपनी न सिखलाना कहींवा न करना फ़िर्क़ा-बंदी के लिए अपनी ज़बाँछुप के है बैठा हुआ हंगामा-ए-मशहर यहाँवस्ल के अस्बाब पैदा हों तिरी तहरीर सेदेख कोई दिल न दुख जाए तिरी तक़रीर सेमहफ़िल-ए-नौ में पुरानी दास्तानों को न छेड़रंग पर जो अब न आएँ उन फ़सानों को न छेड़तू अगर कोई मुदब्बिर है तो सुन मेरी सदाहै दिलेरी दस्त-ए-अर्बाब-ए-सियासत का असाअर्ज़-ए-मतलब से झिजक जाना नहीं ज़ेबा तुझेनेक है निय्यत अगर तेरी तो क्या पर्वा तुझेबंदा-ए-मोमिन का दिल बीम-ओ-रिया से पाक हैक़ुव्वत-ए-फ़रमाँ-रवा के सामने बेबाक हैहो अगर हाथों में तेरे ख़ामा-ए-मोजिज़ रक़मशीशा-ए-दिल हो अगर तेरा मिसाल-ए-जाम-ए-जमपाक रख अपनी ज़बाँ तिल्मीज़-ए-रहमानी है तूहो न जाए देखना तेरी सदा बे-आबरूसोने वालों को जगा दे शे'र के ए'जाज़ सेख़िरमन-ए-बातिल जला दे शो'ला-ए-आवाज़ से
भारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ादसच्चे एक मुहिब्ब-ए-वतन थे मौलाना आज़ादबू-ए-गुल नौ-रंग-ए-चमन थे मौलाना आज़ादइन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ादआज़ादी का ख़्वाब दिखाया अपने अख़बारों सेबेदारी का पाठ पढ़ाया अपने अख़बारों सेक़ौम का अपनी अज़्म बढ़ाया अपने अख़बारों सेउन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ादक़ैद-ओ-बंद में रह कर भी लिक्खीं कितनी तहरीरेंएक हुए सब हिन्दू मुस्लिम ऐसी कीं तक़रीरेंदेस हुआ आज़ाद हमारा सोचें वो तदबीरेंउन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ाददूर-अँदेशी ऐसी जिस का कोई नहीं था सानीहक़-गोई थी ऐसी इन की बात हर इक ने मानीउन के अज़्म के आगे हो गए दुश्मन पानी पानीउन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ादएक मुफ़क्किर एक मुदब्बिर एक सियासत-दाँ भीमुल्क-ओ-क़ौम की ख़ातिर देने को तय्यार थे जाँ भीक्या दुनिया में पैदा होगा फिर ऐसा इंसाँ भीउन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ाददिल को रौशन कर देती है तफ़्सीर-ए-क़ुरआनइंसानों से उल्फ़त करना था उन का ईमानसब कुछ लिख कर भी बाक़ी था लिखने का अरमानउन के ही ईसार-ओ-अमल से देस हुआ आबादभारत का अनमोल रतन थे मौलाना आज़ाद
ऐ तबीब-ए-अलम-ए-महरूमाँचारा-फ़रमा-ए-हुमूम-ओ-अफ़्कारतुझ से आशुफ़्ता-सरी का दरमाँहैं शिफ़ायाब तुझी से बीमारहै मुदब्बिर तू ही नेचर के शिफ़ा-ख़ाने कीतू ही ला-रैब है मय ज़ीस्त के पैमाने की
बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिएजो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैंबने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भीकिसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहेंमगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैंतिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं
मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वालीअपने तारीक मकानों को तो देखा होता
तू मेराज-ए-फ़न तू ही फ़न का सिंघारमुसव्विर हूँ मैं तू मिरा शाहकार
मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िरहुआ फिर से हुक्म सादिरकि वतन-बदर हों हम तुमदें गली गली सदाएँकरें रुख़ नगर नगर, काकि सुराग़ कोई पाएँकिसी यार-ए-नामा-बर काहर इक अजनबी से पूछेंजो पता था अपने घर कासर-ए-कू-ए-ना-शनायाँहमें दिन से रात करनाकभी इस से बात करनाकभी उस से बात करनातुम्हें क्या कहूँ कि क्या हैशब-ए-ग़म बुरी बला हैहमें ये भी था ग़नीमतजो कोई शुमार होताहमें क्या बुरा था मरनाअगर एक बार होता!
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबाफिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दोउम्र-ए-रफ़्ता के किसी ताक़ पे बिसरा हुआ दर्दफिर से चाहे कि फ़रोज़ाँ हो तो हो जाने दोजैसे बेगाने से अब मिलते हो वैसे ही सहीआओ दो चार घड़ी मेरे मुक़ाबिल बैठोगरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'दअपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगाहम-सुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीचअन-कही बात का मौहूम सा पर्दा होगाकोई इक़रार न मैं याद दिलाऊँगा न तुमकोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगागर्द-ए-अय्याम की तहरीर को धोने के लिएतुम से गोया हों दम-ए-दीद जो मेरी पलकेंतुम जो चाहो तो सुनो और जो न चाहो न सुनोऔर जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ाँ आँखेंतुम जो चाहो तो कहो और जो न चाहो न कहो
यूँ ज़िंदगी गुज़रेगीता चंद वफ़ा-केशावो वादी-ए-उल्फ़त थीया कोह-ए-अलम जो थासब मद्द-ए-मुक़ाबिल थेख़ुसरव था कि जम जो था
फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरासितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएमनिज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरातिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल कीमसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरानिहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबीबड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेराअगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवामदिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवामचमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुलहुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ कोचली है ले के वतन के निगार-ख़ाने सेशराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ कोनज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँकिया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ कोफ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने मेंतिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ कोमक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगेकि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ कोमिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखेकिसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ कोदिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असरतिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ कोबनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं नेचमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ कोफिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबींकिया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ कोवो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वीरहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ कोनफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कलीबनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ कोदुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मींकरे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ कोवो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ कोजला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तूहवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ कोरियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँकि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ कोशगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाएये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए
याद की राहगुज़र जिस पे इसी सूरत सेमुद्दतें बीत गई हैं तुम्हें चलते चलतेख़त्म हो जाए जो दो चार क़दम और चलोमोड़ पड़ता है जहाँ दश्त-ए-फ़रामोशी काजिस से आगे न कोई मैं हूँ न कोई तुम होसाँस थामे हैं निगाहें कि न जाने किस दमतुम पलट आओ गुज़र जाओ या मुड़ कर देखोगरचे वाक़िफ़ हैं निगाहें कि ये सब धोका हैगर कहीं तुम से हम-आग़ोश हुई फिर से नज़रफूट निकलेगी वहाँ और कोई राहगुज़रफिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहमसाया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
मज़लूमरात छाई तो हर इक दर्द के धारे छूटेसुब्ह फूटी तो हर इक ज़ख़्म के टाँके टूटेदोपहर आई तो हर रग ने लहू बरसायादिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आयाया ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहरये मिरी उम्र का बे-मंज़िल ओ आराम सफ़रक्या यही कुछ मिरी क़िस्मत में लिखा है तू नेहर मसर्रत से मुझे आक़ किया है तू नेवो ये कहते हैं तू ख़ुश-नूद हर इक ज़ुल्म से हैवो ये कहते हैं हर इक ज़ुल्म तिरे हुक्म से हैगर ये सच है तो तिरे अद्ल से इंकार करूँ?उन की मानूँ कि तिरी ज़ात का इक़रार करूँ?
वो चाय की प्याली पे यारों के जलसेवो सर्दी की रातें वो ज़ुल्फ़ों के क़िस्सेकभी तज़्किरे हुस्न-ए-शो'ला-रुख़ाँ केमोहब्बत हुई थी किसी को किसी सेहर इक दिल वहाँ था नज़र का निशानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाबहुत अपना अंदाज़ था ला-उबालीकभी थे जलाली कभी थे जमालीकभी बात में बात यूँही निकालीसर-ए-राह कोई क़यामत उठा लीकिसी को लड़ाना किसी को बचानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकभी सच्ची बातों को झूटा बतायाकभी झूटी बातों को सच कर दिखायाकभी राज़-ए-दिल कह के उस को छुपायाकभी दोस्तों में यूँही कुछ उड़ायाबता कर छुपाना छुपा कर बतानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकभी बज़्म-ए-अहबाब में शोला-अफ़्शाँकभी यूनियन में थे शमशीर-ए-बुर्रांकभी बज़्म-ए-वाइ'ज़ में थे पा-ब-जौलाँबदलते थे हर रोज़ तक़दीर-ए-दौराँजहाँ जैसी डफ़ली वहाँ वैसा गानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाज़माना था वो एक हैवानियत कावो दौर-ए-मलामत था शैतानियत काहमें दर्द था एक इंसानियत काउठाए अलम हम थे हक़्क़ानियत काबढ़े जा रहे थे मगर बाग़ियानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानामुक़ाबिल में आए जसारत थी किस कोकोई रोक दे बढ़ के हिम्मत थी किस कोपुकारे कोई हम को ताक़त थी किस कोकि हर बुल-हवस को थे हम ताज़ियानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाख़यालात-ए-पुर-शौक़ का सिलसिला थाबदल दें ज़माने को वो हौसला थाहर इक दिल में पैदा नया वलवला थाहर इक गाम अहबाब का क़ाफ़िला थाइधर दावा करना उधर कर दिखानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो शह-राह-ए-मैरिस के पुर-पेच चक्करवो शमशाद बिल्डिंग पे इक शोर-ए-महशरवो मुबहम सी बातें वो पोशीदा नश्तरवो बे-फ़िक्र दुनिया वो लफ़्ज़ों के दफ़्तरकि जिन का सिरा था न कोई ठिकानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकिसी को हुई थी किसी से मोहब्बतकोई कर रहा था किसी की शिकायतग़रज़ रोज़ ढाती थी ताज़ा क़यामतकिसी की शबाहत किसी की मलामतकिसी की तसल्ली किसी का सतानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकोई ग़म-ज़दा था कोई हँस रहा थाकोई हुस्न-ए-नाहीद पर मर मिटा थाकोई चश्म-ए-नर्गिस का बीमार सा थाकोई बस यूँही ताकता झाँकता थाकभी चोट खाना कभी मुस्कुरानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो हर जनवरी में नुमाइश के चर्चेवो पुर-शौक़ आँखें वो हैरान जल्वेवो चक्कर पे चक्कर थे बारा-दरी केवो हसरत कि सौ बार मिल कर भी मिलतेहज़ारों बहानों का वो इक बहानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो रुख़ आफ़्ताबी पे अबरू हिलालीवो तिमसाल-ए-सीमीं वो हुस्न-मिसालीशगूफ़ों में खेली गुलाबों में पालीवो ख़ुद इक अदा थी अदा भी निरालीनिगाहें बचा कर निगाहें मिला करबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो हर-चंद मुझ को नहीं जानती थीमगर मेरी नज़रों को पहचानती थीअगरचे मिरे दिल में वो बस गई थीमगर बात बस दिल की दिल में रही थीमगर आज अहबाब से क्या छुपानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो इक शाम बरसात की दिन ढला थाअभी रात आई न थी झुटपुटा थावो बाद-ए-बहारी से इक गुल खिला थाधड़कते हुए दिल से इक दिल मिला थानज़र सुन रही थी नज़र का फ़सानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाजवानी अदाओं में बल खा रही थीकहानी निगाहों में लहरा रही थीमोहब्बत मोहब्बत को समझा रही थीवो चश्म-ए-तमन्ना झुकी जा रही थीक़यामत से पहले क़यामत वो ढानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाहमें बीती बातें जो याद आ रही थींवो मख़्मूर नज़रें जो शर्मा रही थींबहुत अक़्ल-ए-सादा को बहका रही थींबड़ी बे-नियाज़ी से फ़रमा रही थींउन्हें याद रखना हमें भूल जानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाअब वो उमंगें न दिल में मुरादेंअब रह गईं चंद माज़ी की यादेंये जी चाहता है उन्हें भी भला देंग़म-ए-ज़िंदगी को कहाँ तक दुआ देंहक़ीक़त भी अब बन गई है फ़सानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाअलीगढ़ है बढ़ कर हमें कुल जहाँ सेहमें इश्क़ है अपनी उर्दू ज़बाँ सेहमें प्यार है अपने नाम-ओ-निशाँ सेयहाँ आ गए हम न जाने कहाँ सेक़सम दे के हम को कसी का बुलानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानामोहब्बत से यकसर है अंजान दुनियाये वीरान बस्ती परेशान दुनियाकमाल-ए-ख़िरद से ये हैरान दुनियाख़ुद अपने किए पर पशेमान दुनियाकहाँ ले के आया हमें आब-ओ-दानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़माना
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
जाने किस की तलाश उन की आँखों में थीआरज़ू के मुसाफ़िरभटकते रहेजितना भी वो चलेइतने ही बिछ गएराह में फ़ासलेख़्वाब मंज़िल थेऔर मंज़िलें ख़्वाब थींरास्तों से निकलते रहे रास्तेजाने किस वास्तेआरज़ू के मुसाफ़िर भटकते रहे
बैठे बे-फ़िक्र क्या हो हम-वतनोउठो अहल-ए-वतन के दोस्त बनोमर्द हो तुम किसी के काम आओवर्ना खाओ पियो चले जाओजब कोई ज़िंदगी का लुत्फ़ उठाओदिल को दुख भाइयों के याद दिलाओपहनो जब कोई उम्दा तुम पोशाककरो दामन से ता गरेबाँ चाकखाना खाओ तो जी में तुम शरमाओठंडा पानी पियो तो अश्क बहाओकितने भाई तुम्हारे हैं नादारज़िंदगी से है जिन का दिल बेज़ारनौकरों की तुम्हारे जो है ग़िज़ाउन को वो ख़्वाब में नहीं मिलताजिस पे तुम जूतियों से फिरते होवाँ मयस्सर नहीं वो ओढ़ने कोखाओ तो पहले लो ख़बर उन कीजिन पे बिपता है नीस्ती की पड़ीपहनो तो पहले भाइयों को पहनाओकि है उतरन तुम्हारी जिन का बनावएक डाली के सब हैं बर्ग-ओ-समरहै कोई उन में ख़ुश्क और कोई तरसब को है एक अस्ल से पैवंदकोई आज़ुर्दा है कोई ख़ुरसंदमुक़बिलो! मुदब्बिरों को याद करोख़ुश-दिलो ग़म-ज़दों को शाद करोजागने वाले ग़ाफ़िलों को जगाओतैरने वालो डूबतों को तिराओहैं मिले तुम को चश्म ओ गोश अगरलो जो ली जाए कोर-ओ-कर की ख़बरतुम अगर हाथ पाँव रखते होलंगड़े लूलों को कुछ सहारा दोतंदुरुस्ती का शुक्र किया है बताओरंज बीमार भाइयों का हटाओतुम अगर चाहते हो मुल्क की ख़ैरन किसी हम-वतन को समझो ग़ैरहो मुसलमान उस में या हिन्दूबोध मज़हब हो या कि हो ब्रहमूजाफ़री होवे या कि हो हनफ़ीजीन-मत होवे या हो वैष्णवीसब को मीठी निगाह से देखोसमझो आँखों की पुतलियाँ सब कोमुल्क हैं इत्तिफ़ाक़ से आज़ादशहर हैं इत्तिफ़ाक़ से आबादहिन्द में इत्तिफ़ाक़ होता अगरखाते ग़ैरों की ठोकरें क्यूँकरक़ौम जब इत्तिफ़ाक़ खो बैठीअपनी पूँजी से हात धो बैठीएक का एक हो गया बद-ख़्वाहलगी ग़ैरों की पड़ने तुम पे निगाहफिर गए भाइयों से जब भाईजो न आनी थी वो बला आईपाँव इक़बाल के उखड़ने लगेमुल्क पर सब के हाथ पड़ने लगेकभी तूरानियों ने घर लूटाकभी दुर्रानियों ने ज़र लूटाकभी नादिर ने क़त्ल-ए-आम कियाकभी महमूद ने ग़ुलाम कियासब से आख़िर को ले गई बाज़ीएक शाइस्ता क़ौम मग़रिब कीये भी तुम पर ख़ुदा का था इनआ'मकि पड़ा तुम को ऐसी क़ौम से कामवर्ना दुम मारने न पाते तुमपड़ती जो सर पे वो उठाते तुममुल्क रौंदे गए हैं पैरों सेचैन किस को मिला है ग़ैरों से
जिस की आवाज़ कानों में सुब्ह सुब्ह चिड़ियों की तरह चहकती थीजिस की मौजूदगी से फ़ज़ाओं में ख़ुशबू सी महकती थीवो मेरी पहली मोहब्बत थीजिस की आँखें देख मुतअस्सिर हो जाते थे हिरननक़ाब से जिस का चेहरा ऐसे झलकता था जैसे सूरज की पहली किरनजिस का मुस्कुराना था कि जैसे वादियों में सहर का आनाकिसी फूल की तरह जिस पे तितलियाँ मंडराया करती थींवो चाँद से आई थी शायद रात में सितारों से बातें किया करती थीजो दिन का पहला पैग़ाम भी थी और रात का आख़िरी सलाम भीसुब्ह-बा-ख़ैर से ले कर शब-ब-ख़ैर तक जो मेरा तकिया-कलाम थीवो मेरी पहली मोहब्बत थीख़ामोशी में छुपाए जज़्बात जो समझ लेती थीबिन ज़ाहिर किए तमाम एहसासात जो परख लेती थीमेरे लिए जो हर कहानी हर एक क़िस्से में थीहर एक शाइ'री हर एक ग़ज़ल के हिस्से में थीजो हर नज़्म में थी और हर मौसीक़ी में भीदिलदार भी थी जो और दुनिया-दार भीशान-ओ-शौकत की इस दुनिया में मुझ ग़रीब की चाहत की तलबगार थीवो मेरी पहली मोहब्बत थीजो माज़ी थी मगर मेरा मुस्तक़बिल न बन पाईमेरे साथ हर हाल में राज़ी थी मगर ज़िंदगी में शामिल न हो पाईप्यार की राह में जो मेरी हम-सफ़र थीजिस के जाने के बाद मेरी ज़िंदगी सिफ़र थीकुछ रिश्ते ख़ून के होते हैं और कुछ दिल केमगर रूह का रिश्ता सिर्फ़ जिस शख़्स से थावो मेरी पहली मोहब्बत थीमेरे तख़य्युल में जो इक तस्वीर बन के रह गईजो दिल में मेरे बस के तक़दीर में किसी और की हो गईजो हमराज़ भी थी और मेरी ज़िंदगी का सब से बड़ा राज़ भीजिस के जाने के मुद्दतों बाद भी उस के वापस आने की एक आस थीवो मेरी पहली मोहब्बत थीवो मेरी पहली मोहब्बत थी
कौन सा स्टेशन है?डासना है साहिब-जीआप को उतरना है?''जी नहीं, नहीं,'' लेकिनडासना तो था ही वोमेरे साथ 'क़ैसर' थीये बड़ी बड़ी आँखेंइक तलाश में खोईरात भर नहीं सोईजब मैं उस को पहुँचानेइस उजाड़ बस्ती मेंसाथ ले के आया थामैं ने उन से फिर पूछाआप मुस्तक़िल शायदडासना में रहते हैं?''जी यहाँ पे कुछ मेरीसूत की दुकानें हैंकुछ तआम-ख़ाने हैं''मैं सुना किया बैठाबोलता रहा वो शख़्स''कुछ ज़मीन-दारी हैमेरे बाप दादा नेकुछ मकान छोड़े थेउन को बेच कर मैं नेकारोबार खोला हैइस हक़ीर बस्ती मेंकौन आ के रहता थालेकिन अब यही बस्तीबम्बई है दिल्ली हैक़ीमतें ज़मीनों कीइतनी बढ़ गईं साहिबइक ज़मीन ही क्या हैखाने पीने की चीज़ेंआम जीने की चीज़ेंभाव दस-गुने हैं अब''बोलता रहा वो शख़्स''इस क़दर गिरानी हैआग लग गई जैसेआसमान हद है बस''मैं ने चौंक कर पूछाआसमाँ महल था इकसय्यदों की बस्ती मेंआसमाँ नहीं साहिबअब महल कहाँ होगा?हँस पड़ा ये कह कर वोमेरे ज़ेहन में उस कीबात पय-ब-पय गूँजी
कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न दस्त-ओ-नाख़ुन-ए-क़ातिल न आस्तीं पे निशाँन सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँन ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़कहीं नहीं है कहीं भी नहीं लहू का सुराग़न सर्फ़-ए-ख़िदमत-ए-शाहाँ कि ख़ूँ-बहा देतेन दीं की नज़्र कि बैआना-ए-जज़ा देतेन रज़्म-गाह में बरसा कि मो'तबर होताकिसी अलम पे रक़म हो के मुश्तहर होतापुकारता रहा बे-आसरा यतीम लहूकिसी को बहर-ए-समाअत न वक़्त था न दिमाग़न मुद्दई न शहादत हिसाब पाक हुआये ख़ून-ए-ख़ाक-नशीनाँ था रिज़्क़-ए-ख़ाक हुआ
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