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नज़्म
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुम्हारी जो हमासा है भला उस का तो क्या कहना
है शायद मुझ को सारी उम्र उस के सेहर में रहना
जौन एलिया
नज़्म
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्त
गर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुनो तन्हा चलना खेल नहीं, चलो आओ मिरे हम-राह चलो
चलो नए सफ़र पर चलते हैं, चलो मुझे बना के गवाह चलो