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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
अहमद फ़राज़
नज़्म
गले में हार फूलों का चरण में दीप-मालाएँ
मुकुट सर पर है मुख पर ज़िंदगी की रूप-रेखाएँ
नज़ीर बनारसी
नज़्म
यही सच-मुच बना देगी तिरे घर को हसीं जन्नत
ज़रा तुम प्यार से करना कभी सरशार औरत को
अरशद महमूद अरशद
नज़्म
कर रक्खा था चेहरा अपना दुख-मुख से बे-परवा उस ने
मेरी तरफ़ तकने से पहले चारों जानिब देखा उस ने
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ
वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ