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नज़्म
सरिश्क-ए-याद ना-मुम्किन सही दुनिया की आँखों में
ज़बान-ए-हाल पर इक आलम-ए-तक़दीर बाक़ी है
राम प्रकाश राही
नज़्म
गुलशन-ए-याद में गर आज दम-ए-बाद-ए-सबा
फिर से चाहे कि गुल-अफ़शाँ हो तो हो जाने दो