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नज़्म
कुकड़ूँ कूँ की तान लगा के मुर्ग़ा गाय ख़याल
क़ुमरी अपनी ठुमरी गाय मुर्ग़ी देवे ताल
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
हम चाँद नगर पर जाते ही खोलेंगे एक नया मकतब
पढ़ने के लिए बच्चों को जहाँ मुर्ग़ा न बनाया जाएगा
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
ऐ मिरे मुर्ग़े मिरे सर्माया-ए-तस्कीन-ए-जाँ
तेरी फ़ुर्क़त में है बे-रौनक़ मिरा सारा मकाँ
असद जाफ़री
नज़्म
बनाया जाता हूँ मुर्ग़ा मैं जिस दिन अपने मकतब में
तो उस दिन दर्द से ये दिल बहुत नाशाद होता है