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नज़्म
नज़र आएँगे हर सू शम-ए-आज़ादी के परवाने
हज़ारों मुर्दा दिल हो जाएँगे बेदार फाँसी से
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
नज़्म
ऐसों का ग़म ग़लत इक दो घड़ी करती है तू
दस्त-ए-शफ़क़त दिल-ए-पज़-मुर्दा पे धरती है तू
अज़ीमुद्दीन अहमद
नज़्म
दिल-ए-मुर्दा को हो वो जज़्बा-ए-बेताब अता
मरज़-ए-पस्ती-ए-मिल्लत का जो दरमाँ कर दे
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
मुझे तेरे तसव्वुर से ख़ुशी महसूस होती है
दिल-ए-मुर्दा में भी कुछ ज़िंदगी महसूस होती है
कँवल एम ए
नज़्म
दुनिया की इल्ला-बिल्ला ठसी पड़ी है मुझ में
हाँ कुछ काम की चीज़ें भी हैं इस कबाड़-ख़ाने में