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नज़्म
उरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ा
समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ
है पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़िंदगी इंसाँ की है मानिंद-ए-मुर्ग़-ए-ख़ुश-नवा
शाख़ पर बैठा कोई दम चहचहाया उड़ गया
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ऐ कि तेरा मुर्ग़-ए-जाँ तार-ए-नफ़स में है असीर
ऐ कि तेरी रूह का ताइर क़फ़स में है असीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बकरे की क़ुर्बानी पर कुछ बकरे मातम करते
मुर्ग़े भी इस मज्लिस में मुँह लटका कर ग़म करते
असना बद्र
नज़्म
ज़ेब उस्मानिया
नज़्म
हैं गल्ला-बान लोगों के पीछे पड़े हुए
और बकरा ले के हम भी हैं मुर्ग़े बने हुए
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
वो जानते हैं कि शाएर है एक मुर्ग़-ए-अजीब
अगर गला है तो शाएर, नहीं गला तो अदीब
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ऐ मिरे मुर्ग़े मिरे सर्माया-ए-तस्कीन-ए-जाँ
तेरी फ़ुर्क़त में है बे-रौनक़ मिरा सारा मकाँ
असद जाफ़री
नज़्म
बर्बाद मुर्ग़-ए-दिल का काशाना कर दिया है
ख़ाली मय-ए-तरब से पैमाना कर दिया है