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नज़्म
हम पे मुश्तरका हैं एहसान ग़म-ए-उल्फ़त के
इतने एहसान कि गिनवाऊँ तो गिनवा न सकूँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवर
तसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुराद
हम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गया
अहमद फ़राज़
नज़्म
मुश्तइल, बे-बाक मज़दूरों का सैलाब-ए-अज़ीम!
अर्ज़-ए-मश्रिक, एक मुबहम ख़ौफ़ से लर्ज़ां हूँ मैं
नून मीम राशिद
नज़्म
ये मेहर-ओ-माह ओ मुश्तरी से हर इलेक्ट्रॉन तक
ये झूम झूम घूमने में जिस तरह का रक़्स है
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
मैं ने जो ज़ुल्म कभी तुझ से रवा रक्खा था
आज उसी ज़ुल्म के फंदे में गिरफ़्तार हूँ मैं