aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "muta.affin"
न ताबनाकी-ए-रुख़ है न काकुलों का हुजूमहै ज़र्रा ज़र्रा परेशाँ कली कली मग़्मूमहै कुल जहाँ मुतअफ़्फ़िन हवाएँ सब मस्मूमगुज़र भी जा कि तिरा इंतिज़ार कब से है
ख़ामोशी मेरा लश्कर हैलफ़्ज़ों की दलदलऔर उस में पलने वाली जोंकेंये मुतअफ़्फ़िन आवाज़ेंमेरी यलग़ार के आगे साबित-क़दम रहेंगी?क्या तुम वाक़ई ऐसा समझते होकि तुम्हारे मैदान इतने फ़राख़ हैंकि मेरे अस्प-ए-असील को थका देंगेतुम्हारे समुंदर इतने मव्वाज हैंकि मेरा रिज़्क़ उलट देंगेऔर तुम्हारे पहाड़ इतने संगलाख़ हैंकि मेरा झंडा न थामेंगे
कितनी अच्छी थी वो ज़मीं माएजहाँ तुम मेरे साथ रहती थीबिस्तर पर रातों को तुम मुझ कोसैफ़-उल-मुलूक औरपरियों की कोई कहानी सुनाती थीआसमान में पूरा चाँद देख करमुझे तामचीनी की थाली मेंतुम्हारी रोटी याद आती थीमचल कर मैं जब रोटी बनाने कीतुम से ज़िद करती थीतो हँस कर टालती मुझ कोतुम ये कहती थींपहले बड़ी तो हो जाओनूर तड़के सूरज की किरनों मेंतुम्हारी मुस्कुराहट जगमगाती थीमुझे बकरियों के पीछे भेज करजब अपने कामों मेंतुम मुझ को भूल जाती थीतो वादी की नर्म घास पर फुदकतेहवा से बातें करती थीतितलियों को हौले से पकड़ करहमेशा छोड़ देती थीतुम ने कहा था माए, किसी को दुख न पहचानाकि तुम अच्छी बच्ची होपरियाँ चिड़ियों के भेस में आ करदाना चुगेंगी मेरी हथेली सेजब कोई चिड़िया चहचहाती थीमैं खिलखिला कर ज़ोर से हँसतीमगर अम्मी अब मुझ कोज़मीं की तरफ़ देख करडर सा लगता हैवो कौन थे माएजिन्हों ने मेरी बकरियों चरागाहों से छीन कर मुझ कोअँधेरों के हवाले कर दिया माएऔर वहाँ से भेजते वक़्त मुझे तुम सेमिलने भी न दियावो इंसान तो न थे मायमगर वोइंसानों जैसे दिखते थेमैं तो अच्छी बच्ची थीतुम बे-शक पूछ लेनाचिड़ियों से तितली सेहवाओं से झील किनारोंकँवल के फूलों सेसरसराते नाग कब आएतुम पूछना इस वादी से पहाड़ों सेमेरी बकरियों से और अब्बा सेमुझे तो इस धरती से प्यार था कितनामैं तुम्हारी तरह रोटी बनातीजब बड़ी होतीढक कर आँचल से सर कोप्यार से खाना खिलातीबस इतना ही तो ख़्वाब था मेरामगर उन लोगों नेमुझे चीरा था माएआरी से बिजली के नंगे तारों मुतअफ़्फ़िन साँसों सेतुम्हें याद है माएमुझे दौड़ते भागतेजब कभी चोट लगती थीमैं दौड़ कर आती थीतुम्हें अपनी चोटें दिखाती थीदुआ पढ़ कर तुम फूँक देती थीमगर उस दिन न आईं तुममैं कितना तड़पी थीदुआओं के सब हिसार क्यों टूट गए माएतुम ने कब बताया थाकोई दर्द ऐसा भी होता हैजो मौत बन कर डोर काट दे साँसों कीऔर नासूर बन करतुम्हारे दिल में ठहर जाए
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