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नज़्म
फिर इसी तरह जहाँ होगा मुक़ाबिल पैहम
साया-ए-ज़ुल्फ़ का और जुम्बिश-ए-बाज़ू का सफ़र
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो जो हमराज़ रहा हाज़िर-ओ-मुस्तक़बिल का
उस के ख़्वाबों की ख़ुशी रूह का ग़म ले के चलो
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुस्तक़बिल की सोच, उठा ये माज़ी की पारीना किताब
मंज़िल है ये होश-ओ-ख़बर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सख़्त हैराँ हूँ कि महफ़िल में तुम्हारी और ये ज़िक्र
नौ-ए-इंसानी के मुस्तक़बिल की अब करते हो फ़िक्र
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तेरी अंखों की गहरी कशिश के मुक़ाबिल में कुछ भी नहीं
और ये तो फ़क़त एक दीवार थी
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
सफ़्हा-ए-दिल से मिटाती अहद-ए-माज़ी के नुक़ूश
हाल ओ मुस्तक़बिल के दिलकश ख़्वाब दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हुकूमत के मज़ाहिर जंग के पुर-हौल नक़्शे हैं
कुदालों के मुक़ाबिल तोप बंदूक़ें हैं नेज़े हैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मुस्तक़बिल की किरनें भी थीं हाल की बोझल ज़ुल्मत भी
तूफ़ानों का शोर भी था और ख़्वाबों की शहनाई भी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मिरे माज़ी ओ मुस्तक़बिल सरासर महव हो जाएँ
मुझे वो इक नज़र इक जावेदानी सी नज़र दे दे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अपने मुस्तक़बिल से ताग़ूती तमद्दुन को है यास
दीदनी है दुश्मन-ए-इंसानियत का इज़्तिराब