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नज़्म
मादर-ए-हिन्द के होंटों पे तबस्सुम होगा
और पेशानी पे सिंदूर का इक नुक़्ता-ए-सुर्ख़
बनो ताहिरा सईद
नज़्म
कहती हैं कोई मुझ को जोड़ा सोहा बना दो
या टाट बाफ़ी जूता या कफ़्श-ए-सुर्ख़ ला दो